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दर्द

Posted by babul on 8/22/2012 09:24:00 AM

आओ कात लें धागा हम तुम।
सिल दें हम अपने रिश्ते को।
जख्मों का इल्जाम न हो तेरे सर,
और जग-जाहिर न हो दर्द मेरा।

  • रविकुमार बाबुल


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4 Comments


सुषमा 'आहुति' जी आपका आना अच्छा लगा.... रचना सराहने के लिए धन्यवाद...


सुषमा 'आहुति' जी आपका आना अच्छा लगा.... रचना सराहने के लिए धन्यवाद...






आओ कात लें धागा हम तुम
सिल दें हम अपने रिश्ते को
जख्मों का इल्जाम न हो तेरे सर
और जग-जाहिर न हो दर्द मेरा


वाऽह ! क्या बात है !
रविकुमार बाबुल जी
बहुत ख़ूब !


नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…
राजेन्द्र स्वर्णकार

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