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अनगिनत सवालों के घेरे में...

Posted by babul on 8/16/2012 08:11:00 PM

हम आजाद तो हुए, लेकिन लोकतन्त्र का वास्तविक अर्थ क्या है यह आज तक नहीं जान पाये। मनमानी और निजी स्वतंत्रता हमारी स्वतंत्रता की परिधि में आयी, उच्छृंलता और अधिकार के चलते राष्ट्रीय भावना का लोप होता चला गया। हमने सदैव अधिकारों की बात तो जोर-शोर से की परन्तु अपने कर्तव्यों की गरिमा को ही हम भूल गये। आज पूरा मुल्क हिंसा, गरीबी और भ्रष्टाचार की जद में आ चला है। यही हिंसा, गरीबी और भ्रष्टाचार हमारी स्वतंत्रता की पराकाष्ठा है। घोर राजनीतिकरण का दुष्प्रभाव यह हुआ कि मुल्क भाषा, साम्प्रदाय और क्षेत्रवाद में बंट गया। आजादी के बाद हमारे स्वप्नदृष्टाओं ने साम्प्रदायिक सद्भाव, ऊंच-नीच की समाप्ति तथा भेदभाव मिटाने के जो स्वप्न देखे थे, वह घटने के बजाय बढ़ते चले गये तथा नेतृत्व का झण्डा उठाये छोटे-छोटे क्षुद्र स्वार्थों से पीड़ित लोगों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हो गये। सत्तालोलुपों ने न सिर्फ हमारे दीन-ईमान तथा सत्यत्व को नेस्तनाबूद किया  बल्कि मुल्क को एक ऐसे दो राहे पर लाकर खड़ाकर दिया जहां आम लोगों का जीवन बदरंग हो चला और सत्ताधीशों और उनके चाटुकारों ने अपने जीवन में भ्रष्टाचार, अपराध एवं दबंगई के दम पर तमाम रंगीनियां हासिल कर लीं। और फिर एक ऐसा संक्रमण-काल आया कि मारा-मारी एवं आपाधापी के दौर में हमारे अपने फर्ज की भूमिका विस्मृृत हो चली। मुल्क से अंग्रेज तो चले गये परन्तु अधकचरे संस्कारों की एक ऐसी संस्कृति छोड़ गये, जिसके प्रभाव से भारतीय मूल की शाश्वत संस्कृति छिन्न-भिन्न हो गयी। नयी पीढ़ी में एक ऐसा भावनात्मक विघटन हुआ कि जीवन-मूल्यों का बदलाव पलक झपकते ही हो गया। वैयाक्तिक स्वतंत्रता तथा भौतिक सुख-सुविधाओं की चकाचौंध में अर्थ की प्रधानता बढ़ती चली गयी। यही से शुरू हुआ आजादी का अवमूल्यन। हर कोई चाहने लगा कि वह स्वतंत्र है, उसके कार्यों में कोई दखल न दे। यहां तक कि सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से वह विमुख हो गया। चिन्ता रही तो सिर्फ इतनी कि उसे जो कुछ मिल रहा है, वह कम है तथा इसकी बढ़ोतरी होनी चाहिए अन्यथा वह विकास की दौड़ में पीछे रह जाएगा एवं उसकी निजी स्वाधीनता घट जायेगी। वैचारिक प्रतिबद्धता आइने में यदि इस आजादी का आकलन हो तो लगेगा कि हालात और भी विकट बन गये। भारतीय संस्कारों की रोशनी लुप्तप्राय:  हो गयी तथा पश्चिम का अन्धानुकरण बढ़ता ही चला गया। यह वह दौर था जब आजादी के तुरन्त बाद भारतीयता का सूत्रपात होना था तथा अधकचरे विचारों का विकल्प परिपक्वता की वैचारिकता की पृष्ठभूमि से भरा जाना था। परन्तु शून्यता से जड़ता को जन्म दिया और एक ऐसी आंधी आयी कि सभी सांस्कृतिक एवं सामाजिक शाश्वत मूल्यों को समेट ले गयी। हम उस मोड़पर आ गये जहां से लौटना असम्भव था और सिवाय उसी रास्ते पर आगे बढ़ने के हमारे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था। स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाते रहे और हम और अधिक गैरजिम्मेदार तथा एकाधिकारवादी बनते चले गये। हमारे भीतर पनपे हठ ने व्यावहारिक जीवन को चालबाज बना दिया और स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी स्वायत्तता ने ले लिया, जिसमें हस्तक्षेप जरा भी पसन्द नहीं था। परिवारों में विघटन हुआ तथा एक छोटी इकाई के रूप में केन्द्रित होने लगी यह व्यवस्था। यह मेरा, वह मेरा, सब मेरा के सिद्धांत से जकड़े हुए जनमानस ने यथार्थ का कठोर धरातल देखना जरा भी नहीं चाहा, इसी का प्रतिफल था कि लोकतंत्र के नाम पर विकृतियां पनपने लगीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था मजाक बनकर रह गयी तथा जनप्रतिनिधि होने का दम्भ भरने वाले ए. राजा, कलमाड़ी, लालू, कनिमोझी और येदुरप्पा माल उड़ाने लगे। जन के सामने केवल बेचारगी शेष रह गयी। एक ऐसा शून्य का घेरा हमारे इर्द-गिर्द बनने लगा कि वैचारिक विपन्नता ने मानव समाज को खोखला बना दिया। सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं परन्तु राजनीति की धुरी एक ही रही।
जानते-बूझते भी हमने जीवन-दर्शन में कर्तव्यों की ओर ध्यान नहीं दिया और उसी का फल था कि आज मुल्क कई तरफ से विघटन के लिए तैयार किया जा रहा है। स्वतंत्रता की इस सालगिरह की सार्थकता तो इस माइने में हो सकती है कि राष्ट्रीयता तथा सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति हर नागरिक सजग रहे तथा अधिकारों की गर्मी से कर्तव्यों की शीतलता को बनाये रखे तो इससे एक सदाबहार खुशनुमा माहौल तैयार हो सकता है। सवाल है तो सिर्फ इतना कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग रोका जाय तथा जो मूल्यहीनता पनप रही है, उसे राष्ट्रभक्ति के जल से सींचा जाये। फिर कोई कारण नहीं कि गणतंत्र की सार्थकता कई अर्थों में राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध न हो।

  • रविकुमारबाबुल



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