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अपनी रूह और आत्मा की वसीयत भी

Posted by babul on 6/06/2012 02:28:00 PM


जी... न जाने क्यूं लगा कि मैं इश्क के जिस दरवाजे पर खड़ा होकर, जिन्दगी की तमाम मुश्किलों और हालातों से परे, दो पल सुकूंन का गुजारना चाहता था.... कि वह उस दरवाजे को खोल देगा..... अन्दर आने की इजाजत देकर? यूं भी मैंने पहले कभी उसके दरवाजे पर जाने की ख्वाहिश रखी ही नहीं थी..., लेकिन उसका नेह-आमंत्रण बीते वर्षों में रिस-रिस कर मेरी रूह में शामिल हो चला है। यह रूह ही मुझे उसके दरीचे पर जाने की जिद् दिलाए बैठी रही....? अब, जब उसके दरीचे पर जाकर मैंने दरवाजा खटखटाया तभी किसी ने कहा कि जनाब दरवाजा क्यूं खटखटा रहे हैं.... ताला लगा है...। यह आवाज दरवाजे के अन्दर से आयी थी या फिर किसी ने बाहर से ही मुझे लगायी थी..... समझ से परे है....लेकिन दरवाजा बंद था? बहरहाल .... आज बैरंग लौटा हूं.... जो कुछ उसके लिए लेकर गया था, वह सब कुछ उसके दरवाजे पर ही रख-छोड़ आया हूं.... इस उम्मीद में कि  शायद कभी उसके काम आये ....., दुआ.... नेह.... उम्मीद.... विश्वास.... आस्था.... और कर्म....। जी मेरे द्वारा उसके लिए बांधी गयी यह पोटली न तो किसी और के लिए थी... और न ही किसी और के काम आ सकती है....कि जिसे कोई  चुरा ले? लेकिन सोचता हूं मेरी तरह कहीं उसने इसे भी स्वीकारा नहीं तब....? यकीन से कुछ नहीं कह सकता हूं...., संशय है।
जी... कभी-कभी मौसम एक ही वक्त में दो तरह का बर्ताव कर रहा होता है, आज का मौसम मेरे अनुकूल नहीं रहा ... हवाएं बेरहम हो चली हैं..... भरते हुए जख्म को कुरेद देने का माद्दा रखने वाली.....? अब किस या किन आंखों से उम्मीद करूं कि उनकी नमी मल्हम बन जाएगी...?
हम सब जानते हैं कि तपन के बाद मौसम का परिवर्तन शीतलता देता है.... बनकर सावन ...। लेकिन किससे पूंछें कि रेगिस्तान सदैव प्यासा क्यूं रहता है...., दूसरों की प्यास बुझाने का सबब बन कर भी....? कभी महसूसियेगा.. प्यास का स्त्रोत रेत....। यही रेत अपनी अंजुरी में उदास हवाएं लेकर इधर-उधर, गिरती-फिसलती रहती हैं... और प्यास की नदी का प्रस्फुटन भी यहीं से होता है, प्यास के बादल भी यहीं से उमड़ते-घुमड़ते उठते हैं.... दूसरों की प्यास बुझाने की खातिर बरसने के लिए...।
जी... जब यह प्यास नमक बन चले वक्त के बदलते दौर में... तब आत्मा और जिस्म ही नहीं बहुत कुछ की प्यास यह जगाता चलता है। ऐसे में आंखों से फिसल उठ लुढ़कता भी है.... आंसू की शक्ल में रूह बन कर .... । जी... इस प्यास को मुझ जैसे रेत में रहने वाले लोग  यकीनन् भलि-भांति जानते हैं.....।
आज वह  इक पूरा रेगिस्तान मुझको सौंप गया....। एक अनबुझी प्यास जगा गया....। उम्मीद है आने वाला वक्त रेत की मानिंद इस प्यास को चरम तक भड़काकर मुझे शांत कर देगा.... सदा-सदा के लिए.....सो शायद उसे भी सुकूंन मिल जाए हमेशा-हमेशा के लिए। जिसे मैंने टूट कर चाहा ... प्रेम किया.... विश्वास किया....... जिस्म ही नहीं अपनी रूह और आत्मा की वसीयत भी लिख दी जिसके नाम.... उससे या उसको अब क्या कहूं....? जब उसकी हर तकलीफ मेरी है.... तो फिर उसके सदैव खुश रहने और रखने की उम्मीद तथा कोशिश ही कर सकता हूं....। वह जहां भी रहे ईश्वर उसे दुनिया सबसे ज्यादा खुश रखे..... यही मेरे आंसुओं का मर्म भी है और मेरे रूह की दुआ भी....  इस प्यास से बस इक दीपक जलता रहे सदा-सदा के लिए.....?

  •  रवि कुमार बाबुल



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3 Comments


prabhaavshali aur bhaavpurn abhivaykti.....


आदरणीय सुषमा जी , यथायोग्य अभिवादन। आप का आना अच्छा लगा.... शुक्रिया....।


जी.... रंग कोई भी हो..... वह बना ही लेता है अपना सा.......

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