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जलूं मैं जिस मोम में

Posted by babul on 6/04/2012 02:33:00 PM
मन में बसा वो, बसा है जिस्म के रोम-रोम में।
इक धागा सा मैं, तुझसा हो कोई इस मोम में।

मेरी बातों से पिघला नहीं क्यूं आज तलक वह,
वक्त की आग में पिघले तू, जलूं मैं जिस मोम में।
  •  रविकुमार बाबुल


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आदरणीय सुषमा जी , यथायोग्य अभिवादन। शुक्रिया अक्षरसाक्षी बनने के लिए....।

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