10

किरचों की तरह हटाया तुमने

Posted by babul on 4/30/2012 12:56:00 AM

क्यूं रिश्ता अपना मुझसे रेत सा बनाया तुमने।
और तमाम वायदों को कांच सा बनाया तुमने।

साथ रहना नहीं था तो टूट ही जाना था इसको,
फिर क्यूं ऐसे ख्वाबों का महल सजाया तुमने।
वक्त   का  क्या,   बावफा  कब रहा है किसी का,
और वक्त  की तरह मुझको  आजमाया  तुमने।

तन्हाई के खराब मौसम में रिश्तों को सम्हाला मैंने,
दुपट्टे के कोरों से किरचों की तरह हटाया तुमने।


मेरे साथ ताउम्र रहने  की बात तुमने ही कही थी,
जोड़ना कभी, कितनी कस्मों को निभाया तुमने।

  • रविकुमार बाबुल



|

10 Comments


शोभा चर्चा-मंच की, बढ़ा रहे हैं आप |
प्रस्तुति अपनी देखिये, करे संग आलाप ||
मंगलवारीय चर्चामंच ||

charchamanch.blogspot.com


खुबसूरत रचना ......भींगते मन की स्वर लहरियां स्पंदित करती हुयीं .....सुन्दर ...


क्यूं रिश्ता अपना मुझसे रेत सा बनाया तुमने।
और तमाम वायदों को कांच सा बनाया तुमने।

अत्यंत सहज रूप में संवेदनाओं का गज़ल में प्रस्तुतीकरण.


कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।


आदरणीय रविकर जी , यथायोग्य अभिवादन। मंच प्रदान करने के लिए .. शुक्रिया...।


आदरणीय उदयवीर जी , यथायोग्य अभिवादन। मेरे शब्दों से आपका मन भींग गया... जानकर अच्छा लगा... शुक्रिया ...।


आदरणीय संगीता जी , यथायोग्य अभिवादन। शुक्रिया ....मेरे शब्दों को सराहने के लिए...।


आदरणीय रचना जी , यथायोग्य अभिवादन। शुक्रिया ... मेरी संवेदनाओं को समझ पाने के लिए..... ।


आदरणीय संजय जी , यथायोग्य अभिवादन। मेरे शब्द आपका मन छू सके .... मैं धन्य हुआ.. शुक्रिया इस इजाजत के लिए...।

Post a Comment

Copyright © 2009 babulgwalior All rights reserved. Theme by Laptop Geek. | Bloggerized by FalconHive.