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चाहता हूं मैं

Posted by babul on 2/25/2012 04:33:00 PM

आओ समेट लें हम,
अपने-अपने हिस्से की यादें,
तुम मेरी यादों को छोड़ देना,
कहीं-किसी बीच राह में।
मैं तुम्हारी यादों को,
रखूंगा सहेजकर सदा अपने पास।
क्यूंकि हम दोनों की यादों ने,
कभी मिलकर की,
गूफ्तगूं आपस में।
तब बे-पर्दा हो जाएगी,
मेरी आदत और तुम्हारी रवायत?
तुम ही नहीं यादें भी तुम्हारी,
शर्मिंदा न हो चाहता हूं मैं।

  • रविकुमार बाबुल

चित्र : साभार गूगल

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6 Comments


भावों से नाजुक शब्‍द को बहुत ही सहजता से रचना में रच दिया आपने.........


बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति..


बहुत ही सुन्दर
गहन भाव अभिव्यक्ति..


आदरणीय सुषमा जी , यथायोग्य अभिवादन। रचना को सराहने के लिए शुक्रिया ... और भावों को महसूसने के लिए भी....।


आदरणीय कैलाश जी , यथायोग्य अभिवादन। शुक्रिया मेरे मन की बात को पढऩे के लिए...।


आदरणीय रीना जी , यथायोग्य अभिवादन। शुक्रिया.... शब्द सुन्दर महसूस हुए आपको।

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