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अनबुझी प्यास

Posted by babul on 2/23/2012 12:05:00 PM

एक वो था,
जो सारा समन्दर,
अपने प्रेम का,
मुझको सौंप देना चाहता था।

एक तुम हो,
जिसके पास मेरे लिये,
प्रेम का एक कतरा भी नहीं है।

यह मेरे नसीब की साजिश है,
या फिर,
उसकी बद्दुआ रही होगी?

जो रह गई,
मेरी प्यास अनबुझी,
तुम्हारे होते हुये भी।

  • रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार

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14 Comments


ओह ………मोहब्बत !!!!!


शुक्रवार के मंच पर, तव प्रस्तुति उत्कृष्ट ।

सादर आमंत्रित करूँ, तनिक डालिए दृष्ट ।।

charchamanch.blogspot.com


खुबसूरत अल्फाजों में पिरोये जज़्बात....शानदार |


वाह...यह हुई न बात......बहुत ही प्यारी कविता


बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना...


बहूत ,बहूत सुंदर रचना है..
काम शब्द गहरे अहसास...
बेहतरीन अभिव्यक्ती...


आदरणीय वन्दना जी , यथायोग्य अभिवादन। जी... मुहब्बत सदैव प्यास जगाती है.... , शुक्रिया।


आदरणीय रविकर जी , यथायोग्य अभिवादन। जी मंच पर जगह देने के लिए शुक्रिया ...शुक्रवार का....।


आदरणीय सुषमा जी , यथायोग्य अभिवादन। जी.. आपने शब्दों को सराहा .... सो शायद खूबसूरत बन गए जज्बात.... शुक्रिया...।


आदरणीय संजय जी , यथायोग्य अभिवादन। संजय भाई... सराहने के लिए... शुक्रिया अच्छा लगा आपका आना...।


आदरणीय कैलाश जी , यथायोग्य अभिवादन। रचना सराहने के लिए शुक्रिया... आपका आना अच्छा लगा।


आदरणीय अरुण जी , यथायोग्य अभिवादन। अनबुझी प्यास को महसूसने के लिए शुक्रिया।


आदरणीय रीना जी , यथायोग्य अभिवादन। मेरे शब्दों में गहराई का अहसास महसूसने के लिए शुक्रिया... आप आए अच्छा लगा।

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