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मुठ्ठी भर उम्मीद

Posted by babul on 12/15/2011 04:25:00 PM

सूरज की मानिंद,
आवारगी  हमारी,
ताउम्र चांद को तलाशती रही।

सूरज की चांद से ,
मिलन की,
बस इक आरजू रही।

कभी किसी रोज,
ग्रहण में वह खो जाये मुझमें,
बस मुठ्ठी भर उम्मीद यही रही।


  • रवि कुमार बाबुल



फोटो गूगल से साभार

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2 Comments


कभी किसी रोज,
ग्रहण में वह खो जाये मुझमें,
बस मुठ्ठी भर उम्मीद यही रही।

गहरे भाव लिए पंक्तियाँ ....शुभकामनायें


आदरणीय मोनिका जी,
यथायोग्य अभिवादन्।

जी..... पंक्तियों के भाव गहरे निकले, यह अहसास दिलाने के लिये शुक्रिया? शुक्रिया शुभकामनाओं के लिये भी। शुक्रिया आने के लिये।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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