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एक नई जिम्मेदारी....

Posted by babul on 11/16/2011 04:50:00 PM


कभी-कभी सोचता हूं, नसीब क्या होता है? नसीब हमारी जिंदगी में आने वाले तमाम दु:ख-दर्द और खुशियों को अपने-अपने हिस्से के खरेपन और खारेपन के साथ अक्षुण बनाएं रखता हैं, जब कभी हमारा लालच मीठापन घोलने की जुर्रत जुटाता है या जब खरेपन में हमारे स्वार्थ का खोटापन सेंध लगा बैठता है, तब नसीब का उकेरा गया अल्फाज माथे की चौखट पर आसानी से पढ़ा भी जा सकता है और जीने के लिये उसे देखते रहने पर मजबूर  रहना पड़ता है? जी... नसीब इसको ही कहते हैं। यकीन मानिये अगर यह न होता तो हम अपनी नाकामियों की जिम्मेदारियों को किसके हवाले करके खुद को पाक साफ बनाये रखने की हैसियत जुटा पाते? अलबत्ता ... जब हमने अपनी कामयाबी पर अपनी पीठ ठोंकी होगी,  तब नसीब आहत हुआ होगा या नहीं सहज ही यह कह पाना मुश्किल है?

जी ... पिछले तमाम वर्ष मैनें अपने शहर में गुजारे ... नमक को आत्मसात करके  इधर-उधर बिखरी  यहां की मिट्टी का स्वाद जिह्वा को कई बार नमकीन कर गया और कई मौकों पर इसी नमक ने ही वह ताकत भी बख्शी कि अपने शहर के लिये कुछ करने का मन हुआ और किया भी, पर रस्म अदायगी से परहेज सदैव किया।  सो ... कई मौकों पर उतनी सफलता नहीं मिली, जो कागजों पर तैयारी के वक्त उकेरी गई थी ... खैर ... इस शहर ने बहुत कुछ दिया, आप भले ही इसे संस्कार कहें, लेकिन सच बोल सकने की ताकत, श्रम की हैसियत सभी कुछ यहीं से मिला। तत्कालीन केन्द्रीय कानून मंत्री के सस्ता न्याय देने की बात पर उनसे ही रुबरु होकर न्याय कब तक बिकेगा पूछने का दुस्साहस मैं इसी शहर में जुटा पाया था? समाचार पत्रों के कागज कारे करते-करते पिछले दिनों बीपीएन टाइम्स आ गया था। कुछ और सच लिखा, जी... सिनेमाई दुनिया की चकाचौंध ने कलाकारों के नजदीक लाकर खड़ा किया। इसी शहर में ख्यातिनाम अभिनेत्री कामिनी कौशल जी से जब मैनें दिलीप कुमार जी के प्रेम-प्रसंग को लेकर कुछ पूछा था तो इस शहर में  यकबायक गुलाबी -सी चादर बिछ गई थी? उसकी खातिर शायद कभी कोई चुनर यह शहर भी ओढ़ ले, और गुलाबी हो जाये, यकीनन शहर छोड़ने के बाद भी यह इंतजार तो किया ही जा सकता है। बीपीएन टाइम्स का नमक खाकर  काम करते समय कई नेता अभिनेता का लिहाफ ओढ़े दिखलायी दिये, और मैंने कई मौकों पर यह शर्मिन्दगी महसूसी ही नहीं, बल्कि साफगोई के साथ कागज पर लिखी भी।
जी... मेरा शहर ग्वालियर जहां संगीत की तान से पत्थर पिघल गये हों ...  पर  प्रेम के आसरे किसी के पिघलने का इंतजार अपने शहर को छोड़ने तलक करना पड़ा? पत्थरों से घिरे शहर में गोलियों की आवाजें डकैतों को सदैव पत्थर दिल बने रहने पर मजबूर किये रहींं, कुछ मौके अपवाद  हो सकते हैं। लेकिन इन्हीं पत्थरों के बीच मेरे तमाम रिश्ते भी बने, जिन्हें छोड़ना अब मेरी मजबूरी भी  है और इस रिश्ते को तोड़ पाना असंभव, मेरी ही नहीं,  इन तमाम रिश्तों के आंखों की नमी यही कहती है। बस... इसी प्रेम के आसरे सोचता हूं कि मेरी ख्वाहिश के चलते, एक उसका पिघलना हो गया होता तो शायद...   इस शहर में कुछ पूरा न होने का मलाल न रह जाता...? 
खैर ... एक नई जिम्मेदारी एक नया शहर उस शहर की मिट्टी का नमक दिल ही नहीं कर्म के धड़कन को किस तरह नियंत्रित करता है, इसका इंतजार तो करना ही होगा? आपकी दुआएं मुझे बेहतर करने के लिये प्रेरित करेंगी यह विश्वास है।


  • रविकुमार बाबुल


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1 Comments


बहुत ही खुबसूरत अभिवयक्ति....

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