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कहीं इस तरह न खो जाऊं मैं कि तुम मुझे ढ़ूढ़ ही न पाओ?

Posted by babul on 8/01/2011 09:53:00 AM
रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


कभी-कभी सोचता हूं, हर रिश्ते का नाम होना ही चाहिये, रिश्ते सदैव नाम के बसीयत के आसरे ही पल्लवित होने चाहिये। अगर ऐसा न हो तो यह रिश्ते मौसम हो चलते हैं, हल्की बूंदें सावन हो जाती हैं, तो थोड़ी सी धूप लेकर आसमान में बादलों की ओट से जब सूरज झांक बैठने का दुस्साहस जुटा बैठता है, तो जेठ की दुपहरी याद हो आती है। लेकिन शुक्र है कि मौसम का नाम है, सावन में बरसती बूंदों के दौर में सूरज का झांकना कभी किसी को जेठ के महिने में नहीं ले जाता है, तब फिर एक रिश्ता जो नाम की तलाश में था, आज भटक कर नाम तलाश रहा था , वह गलत कहां है?
काफी अर्सा हुआ, उसने कोई खबर ही नहीं ली, मेरे शहर में बिखरी तमाम यादों का कतरा-कतरा चुन कर वह इक नये शहर की हो गयी है, उसने नहीं बतलाया था। जाते समय भी उसने पलट कर नहीं कहा था कि रोक लो मुझे..., कहीं इस तरह न खो जाऊं मैं कि तुम मुझे ढ़ूढ़ ही न पाओ? और न ही मैं उसे कोई आवाज लगा सका था, कि रिश्ते के किस नाम को बैसाखी बनाकर मैं उसे आवाज देकर, उससे कहता कि रूक जाओ। जब नाम नहीं था, तब उससे कैसे कहता मैं कि जब भी मन हो, तुम रिश्ते के इस नाम को पुकार लेना मैं आ जाऊंगा?
लेकिन हम दोनों एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह से पहचानते थे, मेरा उसको भूलना असंभव था, तो उसका मुझको भूल जाना? लेकिन हम दोनों के बीच नाम नहीं था?
अक्सर भरी दोपहरी में मैं उसको अपने छांव में रखने की कोशिश करता था, वह भी इस छलावे से संतुष्ट हो, ठण्डक का अहसास पा लेती थी? बरसात में मेंहंदी लगे हाथों में कुछ बंूदें सहेज, जब वह मेरी तरफ उछालती तो समूचे आसमान पर सतरंगी इन्द्रधनुष उग आता, इन्हीं इन्द्रधनुष को मैं सीढ़ी बना उस तक पहुंचने की कोशिश करता, लेकिन वह शांत, निश्छल खड़ी सतरंगी इन्द्रधनुष को मुझ तक पहुंचने की सीढ़ी बनाने से डरती थी शायद...? और तब ही उसके डर से इन्द्रधनुष डरकर बादलों की ओट में छुप जाता, फिर वह और मैं एक बगैर नाम के आमने-सामने होते?
मैनें हमेशा उससे एक नाम की जिद् की और उसने हमेशा साथ रहते हुये भी कोई नाम नहीं दिया.उसकी नियति थी, वह अपनी बनायी लकीर पर चल पड़ी थी। इसलिये उसे कभी किसी नाम की जरूरत ही नहीं महसूस होती होगी? लेकिन तमाम अहसास इस सफर में गुमशुदगी में तो नहीं थे, इसका यकीन वह खुद को कभी नहीं दिला पाई होगी?
रिश्तों की गठरी को लेकर वह सब तरफ अकेले ही भटकती फिरती, शायद कहीं कोई घर मिल जाये? लेकिन वह घर चाहती कहां थी.....? जिस इश्क के आसरे उसने घर बनाने की कोशिश की थी, वह दीवार तो न जाने कब की की ढ़ह गयी थी, अब तो उस दीवार का साया भी उसको मय्यसर नहीं था? सो वह गिरते दीवार की दहशत से इतना खौफजदा थी, कि घर चाहने के बाबजूद घर बनाना जरूरी नहीं समझती थी? मैनें भी चाहा था, उसे चाहरदीवारी मिले, जो आहिस्ता-आहिस्ता घर की शक्ल अख्तियार कर ले, लेकिन उसने कभी अपना मौन नहीं तोड़ा। उसकी खिलखिलाहट भी उसके भीतर की सिसकी को अनसुना कहां रहने दे रही थी। खिलखिलाहट के बीच मच रहे चीख-पुकार को चांद ने सुन लिया था, उसने ही मुझसे कहा था। अब मैं और चांद दोनों ही चुप थे, इस खालीपन में मौन की चीखपुकार को उससे ज्यादा भला कौन समझ सकता था? शब्दों और आवाज की दूरी कुछ इतनी हो गयी थी, कि लगा ताउम्र दौड़कर भी उसे पार नहीं पाया जा सकता है? लेकिन आवाज की तरह ही, उसके द्वारा थमायी गयी प्रेम की डोर का एक सिरा मेरे हाथों में तो था, लेकिन उसके हाथों से दूसरा सिरा छूट गया था। समझ नहीं आता है कि यह डोर उसके हाथों को जख्मी कर रहा था, या फिर उसे किसी और से बांधे रख रहा था? पर आज डोर के दूसरे सिरे पर उसका न रहना, लगता है मेरे भीतर का बहुत कुछ खोल कर ले गया है, सिवाय उसकी यादों को छोड़कर?
अब लगता है कि इस डोर के बावजूद मैनें क्यूं नहीं, उस तक पहुंचने की कोशिश की, शायद उसके हाथ से छूटा डोर का सिरा मेरे ही किसी पाप का परिणाम हो, जो वह जीवन भर मेरे अनचिन्हे पाप के साथ अपने पुण्य के आसरे प्रेम की डोर के दूसरे सिरे को पकड़कर नहीं रख सकती थी?

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