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तुम हो जाओ मेरी

Posted by babul on 7/22/2011 02:15:00 PM

किसी ने किसी को मांगा था,
मिन्नतें खुदा से करके,
जब हार गया खुदा,
उसने उसी से, उसको मांग लिया था?
आज मैंनें भी किया यही,
तुम्हारे साथ, तुम्हीं को मांगने,
खुदा की देहरी पर दी दस्तक मैनें,
वह यकीन दिला दे तुम्हें,
मेरी वफा का।
तुम सदा-सदा के लिये हो जाओ मेरी,
फिर चाहना खुदा का हो या चाहे तुम्हारा?

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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4 Comments


किसी से किसी को मांगने की प्रभावी प्रक्रिया....
बहुत सुन्दर कविता...


beautiful post. THis poem touched my heart,
excellent write!


आदरणीय डॉ. शरद सिंह जी,
जी.... आज निश्ंिचत हूं कि चलो किसी से कभी कुछ छिनने का प्रयास मैनें नहीं किया, शायद यही वजह रही होगी कि किसी से किसी को मांगने की प्रक्रिया आपकी नजर में प्रभावी बन पड़ी है। अच्छा लगा आपका आना, आपका शुक्रिया।
रविकुमार बाबुल
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http://babulgwalior.blogspot.com


आदरणीय संजय जी,
जब कोई शख्स दिल के करीब होता है,तब भले ही शब्द जेहन के आसरे कागज पर उतरें, लेकिन जिगर अपने जैसों को करीब ले ही आता है। सो... मेरे शब्द आपके दिल के करीब पहुंच गये होगें? शुक्रिया इस इजाजत के लिये।
रविकुमार बाबुल
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