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लघु प्रेम कथा ..... ...जिंदगी के बाद भी!

Posted by babul on 6/09/2011 05:10:00 PM

-रवि कुमार बाबुल

आज वह अपने दफ्तर में लगे ए.सी से गरम हवा निकलती हुयी महसूस कर रहा था, कम्प्यूटर के मॉनिटर पर उभर रहे दृश्य कुछ पल में ही प्रश्न-चिन्ह के रूप में सामने आ जा रहे थे? तथा जब यह सारे प्रश्न आपस में गुंथ जाते तो, अचानक उसकी तस्वीर उभर आती? और वह जब उसकी तस्वीर से सवाल करता तो फिर तमाम सवाल स्क्रीन के किसी कोने में उभरी उसकी तस्वीर को लेकर दुबक जाते, और लगता जैसे वह खुद ही स्क्रीन के सामने एक प्रश्न हो चला है? पता नहीं जिंदगी का यह कैसा दौर चल रहा था? उसको समझ नहीं आ रहा था कि जिंदगी कुछ खोने का नाम है या पाने का? लग रहा था जैसे, एक उसको खो देने भर से सभी पायी हुयी चीजें बेमानी सी हो उठी थी, या कहें खो गई सी लग रही थी?
उसने फोन पर उससे कहा था अपनी मुहब्बत के समन्दर का एक कतरा ही मुझे दे दो, सदैव फारवर्ड होती जिंदगी के बीच मैं तुम्हारी यादें रिवाइंड करके वक्त गुजार लूंगा? पर उसने जिंदगी की तरह ही इस सवाल को भी फारवर्ड कर दिया था, इंकार किये बगैर, कोई सहमति भी तो नहीं जतायी थी ? उसे समझ नहीं आ रहा था, कि वह क्या करें, अपनी चाहत को वह डीलिट् करे भी तो कैसे, जिंदगी में कोई की-बोर्ड भी तो नहीं होता है, न ही डीलिट का ऑप्शन? हां जिंदगी की एक की (चाबी) जरूर होती है, जिसे उपर वाले ने देने का दुस्साहस आज तलक नहीं जुटाया है, इसका इस्तेमाल सिर्फ वही करता है हर किसी की तकदीर बदलने के लिये? सो ऐसे में उसके नसीब में वह लिखी थी या नहीं पता ही था उसे? पर इतना यकीन था उसे कि वह इतनी पत्थर दिल नहीं थी कि वह उसकी चाहत को ठोकर मारकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाती? शायद यही वजह थी कि उसने उससे मुहब्बत करके अपनी जिंदगी के लिये एक अलग तरह की मुश्किल पैदा कर ली थी, और आज वह उसको चाहना भी कैसे छोड़ सकता था? वह उससे नफरत करके दु:ख-दर्दो से बावस्ता अपनी जिंदगी को आसान रास्तों पर भी तो नहीं लाना चाहता था, जिद् थी उसकी? शायद उसकी जिंदगी की यही मुश्किलें उससे उसको जोड़े रख रही थी उसको, वह भी तमाम सवालों के साथ आज तलक उससे खुद को जोड़े रख रही थी, कोई दूसरा होता तो बात भी नहीं करता? उसने तय कर लिया कि आज वह उसको मेल करेगा। कम्पोज ऑप्शन में जाकर उसने एक लम्बा खत लिखा था, मेरी चाह में मेरे कोई पाप ही आड़े आये होगें? जो शिद्दत और जिद् के बावजूद, मेरी आंखों के सामने ही-एक रिश्ता घायल-सा दम तोड़े दिये जा रहा है, इसे टूटे हुये रिश्ते के बिखरे तमाम अक्स जीवन पर्यन्त चुभा करेंगे यह तय है? उसने यह सवाल भी पूछ लिया था जिसका जवाब वह कैसे देती, कि पता नहीं तुम्हारे साथ ने मेरा कौन सा कर्ज उतारा है या लाद दिया है मुझ पर से? पत्र के अन्त में याचना थी, बस... मेरी जिंदगी में आ जाओं, गुलजार साहब की नज्म की तरह मैं भी तुम्हारी जिंदगी के हर दाग धो लूंगा? मैं तुमसे प्रेम करता हूं । उसने कुछ इस तरह हूं पर जोर देकर की-बोर्ड का बटन दबा दिया था जैसे किसी मुंसिफ ने किसी को मौत की सजा देकर अपनी कलम की नींब अपने हुक्म के फरमान पर गड़ा कर तोड़ दी हो?
सैंड ऑप्शन पर जाकर वह काफी देर तक सोचता रहा, भेजंू या नहीं,  कोई दूसरा न पढ़ ले, कोई साथ हुआ उसके तो उसे शर्मिन्दगी झेलनी पड़ेगी? कहीं उसके मेल का पासवर्ड किसी ने चुरा लिया हो वह इसे कहीं फारवर्ड कर दे तो.....? उसने जवाब नहीं दिया तो..... जैसे अनगिनत तमाम सवालों के बीच अंतत: उसने मेल कर दिया? कुछ देर में मॉनिटर स्विच ऑफ मोड में चला गया। लेकिन मेल के जवाब में उसका भेजा मेल रिसीव हो गया था, कम्प्यूटर स्विच ऑफ होने के बावजूद, वह स्क्रीन पर पढ़ रहा था उसने लिखा था हां... मुझे भी तुमसे प्रेम है...? उसने लिखा था कि यह कहने की नहीं, महसूसने की बात होती है? इतनी सी बात भी नहीं समझे?
आज दफ्तर से लौटते वक्त सब कुछ उसका अपना ही लग रहा था, होर्डिंग पर अपना मकान खरीदे को वह घर बना रही थी, कार का विज्ञापन देख वह बगल की सीट पर उसे बैठा कर लांग-ड्राइव पर चल निकला था, स्कूल के विज्ञापन से कुछ तुतलाती सी आवाज उन दोनों के बीच से आ रही थी? और वह जो साथ थी, शायद तभी लिखा था कि हीरा है सदा के लिये? अगले ही पल अवसाद से घिर गया था वह , होर्डिग पर चस्पा था जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी? पता नहीं वह उसकी जिंदगी में नहीं आयी तो ऐसे में जिंदगी, जिंदगी रह ही कहां जायेगी, जो जिंदगी के बाद की चिन्ता की जाये ?                                                                                             चित्र गूगल से साभार 


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13 Comments


sir bhut achchi hai .. jindagi ke sath bhi jindagi ke bad bhi ... i have no words to express ....


कभी कभी कुछ रिश्तों को लेकर हमारे मन में अजीब सी कश्मकश चलती रहती है. हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम उन रिश्तों को पाकर खुश हैं या खोकर दुखी. मन कश्मकश को बहुत ही ख़ूबसूरती से लिखा है आपने.


कभी कभी कुछ रिश्तों को लेकर हमारे मन में अजीब सी कश्मकश चलती रहती है. हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम उन रिश्तों को पाकर खुश हैं या खोकर दुखी. मन की कश्मकश को बहुत ही ख़ूबसूरती से लिखा है आपने.


आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (11.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)


bhut hi sarthak prastuti...ek alag andaz me jindgi ki kasmaks ko parstut kiya hai apne...!


बहुत बढिया लिखा है .. बधाई !!


ज़िन्दगी की कशमकश को बखूबी उतारा है।


प्रिय कनक जी
यथायोग्य अभिवादन् ।

जिंदगी के साथ भी ... जिंदगी के बाद भी बहुत कुछ बचा रह जाता है जीवन में। हां, वह जो जिंदगी के साथ हो लेते, शायद तब जीने का सलीका आ जाता? खैर... ख्वाब उसके साथ का और डर जिंदगी में उसका साया छूटने के बाद का? तन्हा ढ़ो रहा हैं वो, जो इजाजत नहीं दी होगी साथ निभाने की उसने। आखिरी श्वांस तक इंतजार...। सिर्फ... इंतजार किया जाना चाहिये.....?

रविकुमार बाबुल


आदरणीय ममता दीदी जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपके व्यक्त विचार मिले जिंदगी के बाद भी.... पर। आपने सच कहा है कि अनिर्णय सी स्थिति हो रहती है कभी-कभी कुछ रिश्तों को लेकर, जो अचानक ही जीवन में बन जाते हैं? सच तो यह है यह कश्मकस तब ज्यादा होती जब कोई रिश्ता दूर रहना चाहता है, और हम उसे पास लाना चाहते हैं? रिश्तों को सराहने के लिए धन्यवाद।

रविकुमार बाबुल


आदरणीय सत्यम शिवम जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

मेरी रचना को उम्दा श्रेणी में रखने के लिये शुक्रिया। शुक्रिया इस बात के लिये भी कि आपने चर्चा मंच का मंच मुझे दिया, शुक्रिया चर्चा में रखने के लिये।

रविकुमार बाबुल


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपने मेरे लिखे को सराहा, इसके लिये धन्यवाद। हर जिंदगी का अलग-अलग अंदाज होता है, जिनके होर्डिंग पर दिखते ख्वाब पूरे हुये उनकी तथा जिनके नहीं हुये उनकी भी जिन्दगी की कश्मकस तो जारी रहेगी, अच्छा लगा आपका आना।

रविकुमार बाबुल


आदरणीय संगीतापुरी जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपको मेरा लिखा जितना अच्छा लगा उससे कहीं अधिक प्रसन्नता मुझे आपके मेरे ब्लॉग को पढऩे से हुयी। शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल


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आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

शब्दों के रास्ते कागज पर उतारी गई एक जिंदगी की कश्मकस को सराहने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल

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