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नसीब // रिश्ते

Posted by babul on 6/06/2011 06:03:00 PM


नसीब 

मेरे नसीब ने जब चाहा था,
तुझको मुझसे छीन लेना।
मैंने चुराकर वक्त की नजरों से,
तेरी यादों को बो दिया था।

अब दिल मैं चुभता है कुछ,
यकीनन यह वो कांटा होगा,
जो फूलों की चाह में उग आया था?
तुमसे जुड़ी हर याद को
सम्हाले रखने की जिद् में।

रविकुमार सिंह
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रिश्ते

जानता हूं मैं,
रिश्ते बदलने में
महारत हासिल है?
इसलिये,
मैंने उसके सामने,
उससे अपना रिश्ता,
बचा लिया?
अपने चाहने को
जब मैंने छिपा लिया?

रविकुमार सिंह
http://babulgwalior.blogspot.com/


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2 Comments


सभी कविताएं मन को छूने वाली हैं....


आदरणीय डॉ. (सुश्री) शरद सिंह जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

मेरी रचनाओं ने आपके मन को छू लिया, जानकर अच्छा लगा। आपके आने का शुक्रिया।

-रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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