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अपराधी

Posted by babul on 6/26/2011 10:26:00 AM

तुमने ही कहा था कभी,
जो प्रेम छिपाये  वो अपराधी।
और जब मैंनें ,
जतला दिया,
मुझे है प्रेम तुमसे,
तब भला क्यूं,
तुम्हारी निगाह में,
मैं अपराधी हो गया?

  • रविकुमार सिंह


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16 Comments


बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......


आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (27-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/


जज़्बात खूबसूरती से लिखे हैं


bahut sunder bhavmai prastuti.sunder saral shabdon main gahrai liye hue.badhaai.sweekaren.




please visit my blog.thanks.


लाज़वाब शिकायत...बहुत अच्छा


बहुत सुन्दर..


आदरणीय डॉ. (सुश्री) शरद सिंह जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... मेरी रचना भावपूर्ण लगी, इसके लिये धन्यवाद।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपके सराहने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपको रचना अच्छी लगी, शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय अना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

मेरा अपराधी होना इतना सहज या सरल नहीं था। लेकिन जब अपराधी हो ही गया हूं, तो सोचता हूं सजा भी मिल जाये? शुक्रिया सराहने के लिये।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय संगीता स्वरूप जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी.....सच है यह जब कोई यह कहे कि कुछ छिपाना अपराध है, और जब इसी के आसरे सच कह दिया जाये तो फिर यह कहा जाये कि यह भी अपराध है? तब बड़ी विचित्र स्थिति बन चलती है, शायद इसी विचित्रता ने खूबसूरती बख्श दी हो? शुक्रिया आने के लिये।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय प्रेरणा जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... आपकी बधाई स्वीकार्य है। आपके ब्लॉग पर घूम आया हूं, बहुत सुन्दर शाब्दिक संसार रचा-बसा रखा है आपने? मेरी रचना पसंद आयी, शुक्रिया। यह सरल शब्द एक अक्स को आज तलक कठिन क्यूं लगते रहे है, समझने की कोशिश कर रहा हूँ?

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय चन्द्रभूषण गाफिल जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... गाफिल साहेब, आपसे रू-ब-रू हो कर पहली बार जाना कि शिकायत भी लाजबाव होती है? आपको रचना अच्छी लगी, शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय कैलाश जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

उससे पूछा गया एक सवाल, कब कविता की शक्ल अख्तियार कर बैठा, पता ही नहीं चला। आपका आना अच्छा लगा, जो आपने सवाल को सुन्दर बना दिया?

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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