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कोशिश

Posted by babul on 6/25/2011 09:03:00 AM



जिसने चाहा मुझको,
उससे मैंने कभी,
मिलना ही नहीं चाहा?

जिसको चाहा मैंने,
उसने कभी कोशिश नहीं की,
मिलने की।

-रविकुमार बाबुल 
                                    ग्वालियर

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2 Comments


चाहा जिसको
उससे मिलने की कोशिश नहीं की |
आखिर तुम कर क्या रहे थे |
क्या वो ग्वालियर के किले पर थी --
और वहां कड़ा पहरा था ||

शायद इसीलिए "कुछ" लोग ३० साल पहले
झाँसी से आकर यहाँ चुप गए हैं |


आदरणीय रविकर जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... रविकर जी, कोशिश की थी मैंने, लेकिन आपने सुना होगा कि ताली कभी एक हाथ से कहां बजती है, सो... न तो वह किले पर थी... और न ही वहां कोई कड़ा पहरा ही था? लेकिन उसके दिल ने, उसको कोशिश की इजाजत नहीं दी होगी? कहीं आपका अतीत मेरा भी तो इतिहास नहीं बनेगा? जो 30 वर्षों पूर्व झांसी से आकर ऋृषि गालव की नगरी को कह लें या फिर तानसेन की, जीवन के सुर में ऐसे खो गये कि पीछे छोड़ आये कि कुछ याद ही नहीं रही?
जी... अच्छा लगा आपका आना।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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