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... जल्द लौट आऊंगी

Posted by babul on 6/23/2011 03:21:00 PM

रविकुमार बाबुल

पता नहीं आज उसको क्या हो गया था, उसके चेहरे पर कुछ अनमना सा कुंचालें भर रहा था, और उसकी आंखें शून्य में कुछ ढूंढ़ रही थी। मैंने कई बार पूछा कहो.....क्या हुआ, उसने कुछ कहा ही नहीं, बस चुप रही वह। पहली बार वह मेरे जितने करीब बैठी थी, पर लगा पहली बार ही वह मुझसे उतनी दूर हो रही थी। उसको आज जाना था, वह अकेली जा रही थी। मैं बहुत कुछ सोच रहा था उसको लेकर, फिर खुद ही यह ख्याल हो आया कि जिंदगी के तमाम दु:ख दर्द से तो सफर की तकलीफें सदैव कमतर ही होती हैं? सो मैं उसकी यात्रा के बारे में सोचना छोड़, अब उसके नसीब को टटोल रहा था। उसे सफर अच्छा नहीं लगता है, मुझसे उसने कहा था? मैंने उसकी बात काट दी थी, सफर सदैव चाहेनुसार ही नहीं होते हैं, जिंदगी की तरह ही बहुत बार अनचाहे चलना पड़ता है किसी नये को पाने के लिये? मेरी बात पर उसने भी अपनी सहमति जता दी थी। पर क्यूं लगा जैसे शायद मेरे साथ भी वह अनचाहे ही चल रही हो? मैंने कहा जल्दी आ जाना, अच्छा नहीं लगेगा बगैर तुम्हारे? उसने कहा था, एक मुझको छोड़, सभी तो हैं? भीड़ में कोई तन्हा कैसे हो जाता है मुझे आज महसूस हो रहा है, मैंने कहा था उससे। उसने मेरी भीड़ बनने का वायदा तो नहीं किया, लेकिन कह दिया था चाहते हो तो जल्द ही लौट आऊंगी?
लगा जैसे आज मेरा नसीब ट्रेन का ड्रायवर और गार्ड लिख रहे थे, सिंग्नल हो गया था, उससे बिछडऩे का वक्त आ चला था। कोरों से पिघलती नमी को मैंने अपनी आंखों की कसम दे दी थी, साक्षी पलकों को बना लिया था, कि उसके बिछडऩे से पहिले अश्क बन कर आंखों से झांकना मत? मेरी कसम का मान रख लिया गया था? उसने अपना हाथ मेरे हाथ में देते हुये जल्द आने का वायदा किया, पर लगा जैसे वह बिछड़ते हुये कह रही हो मैं अपनी हथेली की खुशबू छोड़े जा रही हूं अब शिकवा न करना तुम्हें तन्हा छोड़े जा रही हूँ? और उस खुशबू का सिरा ही पकड़ कर, बोझिल कदमों से मैं अपने घर उस रोज पहुंच सका था?

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4 Comments


बहुत ही तिलमिलाते अहसासो को संजोया है।


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आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

तिलमिलाते अहसास के आसरे आपका आना सुखद लगा। अब तो बस... उसका लौटना बाकी रहा......। शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

सुषमा जी, सराहने के लिये तहे दिल से आपका शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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