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कुछ शब्द बरसे हैं

Posted by babul on 6/19/2011 04:27:00 PM

कुछ भींगीं बातें और भींगो देती हैं? बरसात की बूंदे तन भले ही सराबोर कर दे, लेकिन मन सूखा रह जायेगा, यकीन से कौन कह सकता है? कुछ ख्वाब तर हुये, या कहें बेघर हुये? सो... इन आंखों की बरसात को उलाहना अब कहां मिलेगा, इल्जाम जो बरसात के सर गया? याद में किसी के कुछ शब्द बरसे हैं, जो आपके बहाने शायद वह चुन ले ..........।


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यादें


बरसो बादल, जमकर बरसो?
मेरी आंखों से बरसते,
तन्हाई के बादल,
कोई बरसता हुआ न देख ले?
मालूम है,
वह नहीं भींगती है अब,
यादों में मेरी?
महफूज होगी वह,
बगैर मेरे भी?
फिर भी तमन्ना है मेरी,
बस एक बार फटे बादल,
और वह जिस्म ओढ़ ले मेरा,
सांसें दे दूं अपनी उसको?
ताकि ताऊम्र मेरी याद में,
बह बरसती रहे।
और मैं,
तमाम बूंदों की शक्ल अख्तियार कर,
उसे भींगोता रहूं,
बन कर याद।


रविकुमार बाबुल 
ग्वालियर
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भींगते कुछ ख्वाब


बारिश में भींगते कुछ ख्वाब मेरे,
खो गये है कहीं,
मेरी आंखों से टपक कर?
जब तुम कागज की किश्ती
बहा रही हो?
और बहता यह ख्वाब,
कहीं मिले तुम्हें
तुम इसे अंजुरी में रख,
सच कर लेना,
इन बूंदों को मोती कर देना?


रविकुमार बाबुल 
ग्वालियर
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साजिश

बारिश की साजिश नहीं थी,
पता था उसे,
मेरी आंखों का नसीब?
जब दिल का गम,
आंखों से बह आया था,
पढ़ लिया था बारिश ने?
तुमने ज्यों अपनाया नहीं मुझको,
पलकों ने भी,
इन बूंदो को कहां गले लगाया?
आज मैंने,
अश्कों को दरिया बना लिया,
तेरी तमाम यादों की किश्ती को
बहा दिया।

रविकुमार बाबुल 
ग्वालियर
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  • सभी चित्र गूगल से साभार 


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12 Comments


आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/


बारिश की बूँदें हो या आंसुओं की ...
दोनों ने खूब भिगोया ...
भावप्रवण अभिव्यक्ति !


तीनों रचनाएँ भीगी भीगी सी ...सुन्दर प्रस्तुति


बहुत अच्छा अंदाज़ , बहुत सुंदर रचनाएँ


आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपने चर्चा मंच का मंच दिया। आभार। आपको रचना पठनीय लगी और आपने सांझा किया, शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय वाणी गीत जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

चेहरे पर से लुढ़कती आंखों से टपकी बूंद, धरती को डूबो देने की जिद् में बरसती बूंदे? ऐसे में कहां बच सकता है कोई भींगने से सो.... ऐसे में भींगना तो था ही ....। विचार देने के लिये शुक्रिया। रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय अना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

बूंदे होती ही सुन्दर हैं, सराहने के लिये धन्यवाद।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय संगीता स्वरूप (गीत) जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

बारिश की तीन बूंदें, जब खुद भींग-सी गई, ऐसे में किस सिरे से वह सुन्दर हो गयी.... कह नहीं सकता? सराहने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय रजनीश तिवारी जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

बूंदों के अंदाज को सराहने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय रविकुमार बाबुल जी
नमस्कार !
तीनों रचनाएँ एक से बढ़ कर एक है........सुन्दर प्रस्तुति


आदरणीय संजय जी,
संजय जी शुक्रिया, आपको मेरी रचनाएं पसंद आयीं । आपने इसे पढ़ा ...सो यह सुन्दर बन पड़ी। शुक्रिया अपने विचारों से आपने अवगत करवाया।
रविकुमार बाबुल
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http://babulgwalior.blogspot.com

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