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लघु प्रेम कथा हां... कह दो तुम, कैनवास पर बिखर जाऊं मैं

Posted by babul on 6/16/2011 11:32:00 AM

रविकुमार बाबुल

पता नहीं यह क्षणिक आकर्षण था उसके प्रति या वाकई में मुहब्बत के तूफान ने मेरे दिल के दरवाजे, उसके लिये तोड़ दिये थे? और वह इस तूफान से अंजान, न जाने कब मेरे दिल में आकर बैठ गयी थी, मुझे पता ही नहीं चला? तिस पर दिल के डॉक्टर यह खोज किये बैठे हैं, कि दिल के दरवाजे सदैव भीतर की तरफ खुलते हंै, और बंद हो जाते है, किसी का निकल पाना बहुत ही दुरूह काम है..., जो यहां एक बार आया तो समझो कि यहीं पर बस कर रह गया?
यह सच है उसे मुझसे कभी नफरत नहीं रही, लेकिन उसने मुझे चाहा भी है, यह दावा मैं कतई नहीं कर सकता हूं। लेकिन एक बात तो तय है, कि कहीं न कहीं मैं उसकी आदत में आ गया था। मेरी ही तरह कई बार वह परेशां हो जाती थी, जब मैं उसका फोन नहीं रिसीव करता। लेकिन फिर किसी बच्चे के रेत के बनाएं घरौंदों की तरह मैं खुद ही अपनी जिद् तोड़ देता उससे बात कर के?
उसका मासूम-सा चेहरा अन्य किसी लड़कियों सा-ही था, लेकिन चांद का कमतर। वह रोशनी थी, शायद यही वजह रही कि रोशनी  के बावजूद मुझे औरों की तरह उसका जिस्म कभी अच्छा नहीं लगा? लेकिन उसका दिल, उसके चेहरे से भी ज्यादा खुबसूरत था, या यह कहें कि पवित्र निकला? कभी उसका दिल मस्जिद में अजान देता सा लगा तो कभी गुरूवाणी का पाठ, यह भी तो इंकार नहीं मुझको, कि मंदिर में बजता शंख नहीं था उसका दिल? शायद यही वजह रही थी कि साहिर के पीछे बदहवास दौड़ती अमृता प्रीतम और अमृता के पीछे भागते इमरोज...। कुछ-कुछ ऐसा ही दोहराया जा रहा था मेरे नसीब में? जी... वह भी तो किसी साहिर के पीछे दौड़  रही थी और इधर मैं इमरोज के किरदार में ताउम्र के लिये अपनी अमृता का हो जाना चाहता था? जब वह मुझसे मिली थी, लगा था जैसे हाथ पकड़ कर कह दूं उससे कि तुम अपना जिस्म किसी अपने साहिर के लिये रखे रहो, लेकिन मुझको अपना दिल देकर तुम मेरी पूजा बन जाओ, यह इजाजत देकर तुम मुझको चारों धाम की यात्रा के बाद का-सा सुकून दे दो? तुम मेरी चाहत का दीपक बन जाओ, सच मैं तुम्हें दीपक की मानिंद बहती आवारा हवाओं से बचाये रखूंगा, अपनी हथेलियों में छिपाकर। मैं तुम्हारी इश्क की रोशनी, अपनी हथेलियों के मार्फत महसूसना चाहता हूं, हां..... बाती बने, तुम्हारे जिस्म से कभी मेरी हथेलियां भूले से भी छू जाये, तो मेरी हथेलियां जल जायें? और टीस जलन की मुझे तुम्हारे जिस्म से दूर ले जाये लेकिन तुम्हारे दिल के और करीब ले आये। तुमको चाहने के बाद, ईश्वर से बस यही तो चाहा है मैंने?
पर आज तलक तुमने कुछ कहा नहीं, सदा खामोश रहीं तुम। जबकि जानता हूं मैं , तुम जाकिर हुसैन के तबले की धुन हो, अमजद अली खां साहब की संतूर हो तो कभी चौरसिया की बांसुरी बनी तुम। हुसैन का कैनवास भी हो तो अचानक मुक्तिबोध का एहसास दिलाती काव्याजंलि बन जाती हो तुम...? मुहब्बत में अपनी इजाजत देकर सुरों को हां से सजा लो? रंगो से सराबोर करके कैनवास पर हां लिख दो? जिंदगी की कविता को सार्थक बना दो, अपनी अंजुरी में हां के शब्दों की इजाजत देकर। तुम मेरी चाहत को मुकम्मल कर दो, अपनी हां को खुद का राग बनाकर या कैनवास पर तमाम रंगों में हां का विश्वास सजा कर? मुक्तिबोध की कविताओं में तमाम हां ढूढ़कर तुम मुझे अपना लो? मैं पूरी जिंदगी तुम्हारे हां के आसरे संगीत में सुर-सा घुल जाऊंगा, रंगों की तरह कैनवास पर बिखर जाऊंगा तमाम कविताओं का शब्द बन जाऊंगा, बस तुम हां की बसीयत लिख देना? अगर तुम ऐसा न कर सकीं तो समझ लेना कि  जीवन-संगीत अनसुना रह जायेगा, मेरी खुशियों का कैनवास कोरा और वक्त की सभी कविताएं अनपढ़ी ही रह जायेंगी?

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4 Comments


कविता-सा गद्य एक सुन्दर पोट्रेट की तरह... बधाई.


आदरणीय शरद जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

कागज के कैनवास पर शब्दों की लकीरें, किस रूप में क्या कह गयीं आपसे यह जानकर अच्छा लगा। इस पोट्रेट को पढऩे या देखने के लिए आपका शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

पोस्ट सार्थक लगी, जानकर अच्छा लगा। अपने अमूल्य विचार से अवगत करवाने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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