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बुलबुले को अपने प्रेम का साक्षी बना लो...?

Posted by babul on 6/18/2011 03:01:00 PM


-रविकुमार बाबुल

न जानें क्यूं आज घड़ी की सुई रेंगती हुयी-सी लग रही थी, ऐसा लग रहा था कि वक्त के पैरों में किसी ने कुछ भारी चीज बांध दी है, और वह धीरे-धीरे सरक रहा हो? उसको मेरे साथ कहीं जाना था, कुछ काम था उसको, लेकिन बेताबी मुझे हो रही थी, ऐसा लग रहा था कि घड़ी की सुई पकड़ कर मैं लटक जाऊं और उसके पास तय समय पर पहुंच जांऊ, लेकिन उसकी घड़ी में तो वही बजेगा न, जो वक्त के अनुसार बजना चाहिये था? खैर... मेरी बेताबी खत्म हुयी। वह अब मेरे साथ थी, उसके कहे शब्द आज कुछ दर्द में सराबोर से हो रहे थे? पता नहीं उसका क्या छूट गया था, या फिर उसका चाहा क्या नहीं मिला था उसे? उसने कभी बतलाया नहीं, और मैं कभी पूछने का साहस नहीं जुटा पाया? लेकिन अभी वह मेरे साथ मेरा साया बनकर चल रही थी? गाड़ी के पहिये कुछ थमते से लग रहे थे, जैसे लग रहा हो वह कह रहे हों, थोड़ा ठहर जाओ, पूछ लो आखिर उसके चेहरे की मुस्कुराहट के पीछे दिल के किस दर्द की साजिश है? उसको पढऩे के लिये मैंने बैक मिरर की जद में उसके चेहरे को ले लिया था। एक बारगी तो लगा कि उसके मासूम चेहरे पर मैं अपनी उंगलियों को फेर कर उसका सच जान लूं, लेकिन यह साहस इसलिये नहीं जुटा पाया कि कहीं मेरी उंगलियों से उसके चेहरे पर खरोंच न पड़ जाये? आग उगलती सूरज की तपिश के बीच मुझे भी अचानक ठण्डक का एहसास हो चला था, शायद यह हम दोनों के साथ का ही जादू था, जो तपिश पर भारी पड़ रहा था। मौसम का तल्ख तेवर तो छोडिय़े, सड़क पर फर्राटे भरते वाहन और सड़क पर सरकते लोग कुछ भी दिखना बंद हो गया था मुझे, एक उसके चेहरे को देख कर। ऐसे में ही उसने अपने चेहरे को दुपट्टे से बांध लिया था, गर्म हवाएं जो उसके नर्म गालों से शरारत का दुस्साहस जुटा रहीं थी। लेकिन उसने अपनी आंखों को खुला रख छोड़ा था, उसकी हिरणी सी आंखे मेरी मंजिल का रास्ता बनी जा रही थी, लग रहा था, यह सड़क भले ही मुझे किसी मंजिल पर न ले जायें, लेकिन उसकी आंखों ने जो सड़क बिछायी थी, वह जरूर मुझे उसके दिल तक ले जाने की जुर्ररत जुटाये बैठी थी? पर आम सड़कों की तरह शहर में आपका हार्दिक स्वागत है, जैसा कोई होर्डिंग अभी मुझे उसके दिल की सड़क पर नजर नहीं आया था? तब लगा कुछ दूरी शेष है, शायद मुझे थोड़ा और रास्ता तय करना होगा?
बड़ी अजीब-सी स्थिति थी, उसे क्या करना था, वह भूल गयी थी, और मुझे उससे जो कहना था आज वह भी मुझे याद ही नहीं रहा? पर हां... उसके साथ ने एक प्यास जरूर जगा दी थी मुझमें, उसे कुछ पल निहारकर मैं तृप्त होना चाहता था, सो मैंने कुछ खा लेने का आग्रह किया था, उसने भी सदैव की तरह इंकार नहीं किया? हम दोनों अब आमने-सामने थे। आर्डर देते समय भी उसने उसी सहजता का परिचय दिया, कुछ देर पहले जैसा वह ऊंचाई से सीढिय़ों से उतरते हुये दे रही थी? गिलास में पानी उड़ेलते हुये वह मुझे देख रही थी, और मैं दिल का-सा वजूद रखने वाले कांच के गिलास में पानी के साथ उठ रहे बुलबुले को देख रहा था, यह देख लगा, शायद जैसे वह पूछ रही हो क्या हो गया? और यह सुनकर मैंने सोचा कह दूं कुछ नहीं, इन बुलबुलों में अपनी जिंदगी खोज रहा हूं? पानी में उठे बुलबुले चुन रहा हूं, सोचता हूं उसी बुलबुले को अपने प्रेम का साक्षी बना लूं, जो देर तलक पानी में अपना अस्तित्व बनाये रख पाता है, ताकि तुम भी उतनी ही देर या दूरी तक मेरी जिंदगी बनी रह सको? वह कुछ बोली नहीं थी।
टेबिल पर बैैटर ने दस्तक दे दिया था, मैं उसे खाते हुये देख, तृप्त हो रहा था, लगा एक कौर अपने हाथों से भी उसे खिला दूं और सारी उम्र के लिये अपनी भूख मिटा लूं? लेकिन
उसको घर छोड़कर, उससे मैं बिदा ले रहा था, उसकी आंखों में देखने का साहस नहीं था। क्यूं कि जिस तरह स्टेशन तक छोडऩे आये व्यक्ति की आंखों में, ट्रेन के दो मिनट रूकने के बाद, किसी के बिछडऩे के गम में गालों को रौंदते अश्क को आसानी से देखा जा सकता है? कुछ इसी तरह मैं बिदा हो रहा था। यह कहते हुये कि बहुत जल्द ही मिलेंगे, भले ही यह दुनियां छोटी हो और उसका मिलना फिर भी संभव न लग रहा हो?


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