4

मेरी कलाई पकड़ लो...?

Posted by babul on 6/16/2011 06:02:00 PM



  • रविकुमार बाबुल


उसने अपनी हथेली को अपने हाथों से दबाते हुये कहा, देखो मुझमें बहुत खून है, पता नहीं वह मुझे ड्रैकुला समझ रही थी या फिर...। अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा कर कहा था, देखो लालिमा अभी तक है, कुछ देर बाद ही मिटेगी? लगा जैसे वह कह रही हो, मेरी कलाई पकड़ लो, मेरे चेहरे पर सदा-सदा के लिये लालिमा का घूंघट ओढ़ा दो? मैंने उसकी कलाई पकड़ ली थी, लेकिन कुछ कह नहीं पाया था, पता नहीं वह मुझसे क्या सुनना चाहती थी? हां... उसके लिये जुलाहा बन गया था मैं, लाल चुनरियां कातने लगा था?
  • चित्र गूगल से साभार




|

4 Comments


्सुन्दर भाव


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

कुछ शब्द जब सलीके से किन्हीं यादों को कागज पर जोड़ते हैं तो उनका सुन्दर हो जाना लाजिमी है, यह ऐहसास दिलाने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपके सराहने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

Post a Comment

Copyright © 2009 babulgwalior All rights reserved. Theme by Laptop Geek. | Bloggerized by FalconHive.