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यादें हरी-भरी

Posted by babul on 6/16/2011 11:08:00 AM





उसके लिखे खत को,
बहते पानी में बहाया था तुमने,
लेकिन मैं तुम्हारे लिखे खत,
बहाऊंगा नहीं?
ताऊम्र जलता रहा हूं,
तेरी याद में,
तो फिर क्यूं न तेरा खत भी
मैं जला दूं?
बनकर बादल,
बरस जायेगें यह,
उस तरह जैसे,
बरसती रही है तेरी याद में,
आंखे मेरी?
वक्त की मिट्टी पर,
कुछ यादें रहेंगी हरी-भरी सदा,
खुशबू उनकी,
तुम भी महसूसना,
मैं वहीं किसी गुलाब पर
तुम्हारी खुशबू के पीछे,
जब जख्मी हो रहा होउंगा?


                                                       - रविकुमार बाबुल

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6 Comments


बहुत सुन्दर और मार्मिक भावाव्यक्ति।


मनोभावों को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने.......
हार्दिक बधाई।


आदरणीय वन्दना जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

मेरी अभिव्यक्ति आपको सुन्दर ही नहीं, मार्मिक भी लगी जानकर अच्छा लगा? अपने विचारों से अवगत करवाने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय शरद जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... धन्यवाद, आपने मेरे मनोभावों को पढ़कर, उसे और खूबसूरत बना दिया ऐसा मानना है मेरा। आपके आने और अपने विचारों से अवगत करवाने के लिए शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

आपने मेरे लिखे को सराहा, आपका शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल
ग्वालियर

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