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... वह सारी रात रोटी बनाती रही

Posted by babul on 6/03/2011 06:08:00 PM



-रवि कुमार बाबुल

वह कॉलेज में पढ़ती थी, साथ ही कहीं कुछ काम भी करती थी। शायद यही वजह थी कि अपने नसीब में चूल्हा-चौका और बासन मांजना लिखवाकर, लाने वाली अन्य लड़कियों की तरह ही थी वह, पर उसने अभी चूल्हा-चौका से दूरी बना रखी थी या बनी हुयी थी। मसलन वह अपनी भूख मिटाने के लिये टिफिन सेन्टर से आने वाले टिफिन के आसरे जिन्दा थी? जो उसे सुबह-शाम तय समय पर मिल ही जाया करता था? हां... छुट्टी के दिन जरूर उसे कुछ ज्यादा भूख लगती थी। सो... उसने उसकी वैकल्पिक व्यवस्था भी कर रखी थी। टिफिन में आये खाने से पेट तो भर जाता था पर इच्छा तृप्त नहीं होती थी? खैर इस टिफिन का नसीब धारावी के झोपड़ पट्टी के लोगों जैसा ही होता है न, उनके वोट तो कीमती होते है, लेकिन जिंदगी मूल्यहीन हो चलती है, सो कुपोषण सदैव पोषित होता रहता है, टिफिन की तरह?
एक राजनीतिक दल ने आज अचानक अपनी मांग मनवाने के लिये शहर को बंद करने का फरमान सुना दिया गया, शहर की रफ्तार तेज हो गयी, हर कोई अपने गतंव्य पर जल्द से जल्द पहुंचना चाहता था? ऐसे में मुझे भी जितना बंद करवाने वाले हुड़दंगियों ने डरा रखा था, उतना ही भूख ने भी डरा दिया था? सोचा जल्दी से होटल जाकर खाना खा लूं, ऐसा न हो कि वह बंद ही हो जाये? माह में साठ बार मिलना होता था, नियमित ग्राहक जो था उसका, सो इसी आसरे भूख मिटने का यकीन था?
होटल पहुंचते ही देखा, रोज व्यस्त दिखने वाले तमाम चेहरे बाहर झुंड में खड़े थे, शटर गिरा था? मुझे देखते ही एक चेहर् ने अपने साथी से कहा, रोटियां हैं क्या कुछ? पता लगा तीन रोटियां और सब्जी के नाम पर पनीर के कुछ टुकड़े गरेबी में तैरते हुये बचे है। जो शटर उठाने के बजाये, पॉलीथीन में पैक कर मुझे थमा दिया गया?
आज शाम से पता नहीं क्यूं भूख उग आयी थी? उधर शहर की कुछ दुकानें जल रही थीं, इधर मेरा पेट? छिपते-छिपाते हॉस्टल पहुंचा? मैं थाली में खाना रख रहा था और मेरी भूख मिट पाती इससे पहले ही उसका फोन आ गया, वह भूखी थी आज उसका टिफिन नहीं आया था? टिफिन वाले की किचन जो आग के हवाले कर दी गई थी? उसने मुहब्बत की तरह ही मेरी भूख पर भी हक जता दिया था, यह कह कर कि खाना या खाने लायक कुछ भी ले आओ, बहुत भूख लगी है? मैं वापस खाना पैक करके उसको दे आया? लौट के आकर बिस्तर पर पड़ी कभी सलवटों से लड़ता रहा तो कभी भूख से.... सुन रखे भूखे पेट नींद भी नहीं आती है के जुमले के बावजूद, मुझे न जाने कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला? सारी रात वह नींद में, मेरे लिये रोटी बनाती रही और हर कौर अपने हाथों से मुझे खिलाती रही। सुबह उठा तो भूख मिट चुकी थी, और कल थाम दिया गया शहर आज दौड़ रहा था।

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2 Comments


बहुत ही बढ़िया ! अच्छा लगा पढ़ कर..शुक्रिया शेयर करने के लिए !
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान


आदरणीय सचिन मलहोत्रा जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

किसी के जीवन का एक सच हो सकता यह, मेरी कल्पना को सराहने के लिये शुक्रिया। आपने अपनी प्रतिक्रिया दी धन्यवाद।

रविकुमार बाबुल

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