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इंसाफ

Posted by babul on 6/02/2011 04:12:00 PM




रविकुमार बाबुल


हां मैं अपराधी हूं,
मैंने अपराध किया है,
तुमसे पूछे बगैर,
तुम्हीं से प्यार करने का?

मेरे मुंसिफ हो तुम्हीं ,
प्यार को स्वीकार कर,
मेरे साथ इंसाफ कर देना?
या फिर करके इंकार ,
खुद अपराधी हो जाना?
तुम्हारे इस गुनाह की,
ताउम्र मैं,
सजा काट लूंगा?

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6 Comments


बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई...


bhut bhut sunder bhaav jinhe apne sabdo me piro diya... bhut muskil kaam apne ithi shani se kar diya... bhut khub...


वाह! ..अच्छा लिखते हैं आप...


आदरणीय शरद सिंह जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

मेरी कविता पसंद आयी, अच्छा लगा यह जानकार? यादें सुन्दर होती हैं, सो उसी सुन्दरता का भाव इस कविता में आपको परिलक्षित हुआ। शुक्रिया, आने के लिये।

रविकुमार बाबुल


आदरणीय सुषमा आहुति जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जिंदगी ने जिस मंजिल को मुश्किल बना रखा है, यह शब्द ही सदैव उन राहों को आसान बना देते है, ऐसा मेरा मानना है? शायद यह काम इसलिये आसानी से हो गया होगा? विचार से अवगत करवाने के लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल


आदरणीय अमृता तन्मय जी,
यथायोग्य अभिवादन् ।

जी... शुक्रिया पढऩे के लिये, आपने बहुत अच्छी तरह से पढ़ा, इसके लिये शुक्रिया।

रविकुमार बाबुल

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