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दोनों ने एक दूसरे की आंखों में कुछ लिख दिया....।

Posted by babul on 5/28/2011 09:55:00 AM




रविकुमार बाबुल


प्रेम आज के दौर में जिस गली को पार कर दिल तक जाना चाहता है, या कहें अपने मुकम्मल इश्क को पाना चाहता है, प्रेम की वह गली न तो आज के दौर में इतनी सकरी रही है और न ही सूनी, कि कोई इसमें आने से कतराये, और जो आ जाये वह जाने से? शायद यही वजह है कि इस गली में प्रेम के आसरे चहल-पहल निरन्तर बनी रहती है, ऐसे में सच्चा और सुच्चा प्रेम पाने की चाह रखने वाले अगर भटक कर आ गये, इस गली में तो यकीन मानियेगा, उनका सब कुछ लुट जायेगा? विश्वास, आस्था, प्रेम, समर्पण और बहुत कुछ। जी... प्रेम अब दिल की धड़कनों के आसरे नहीं, शहर में बिछायी गयी सड़कों के सहारे पनपता भी है और बढ़ता भी है, किसी एक का साथ पाने की जिद् में एक का हाथ छोड़ देना आज के प्रेम का चलन हो चला है? संबंधों के दुहाइयों के सहारे पतित प्रेम जब पतिता बन चले तो लगता है कि शहर में दौड़ते टू-सीटर के पहियों और उसके इंजन की आवाजें इतनी तेज हो जाये कि प्रेम शब्द का उच्चारण, वायदा और कसमें सब कुछ अनसुनी हो जाये या कहें सुनने से रह जायें? जी... कर्कश लगने वाली टू-सीटर की आवाज कुछ तो सुकून देगी? प्रेम का जब आप पीछा करेंगें तो आपको एक अलहदा तस्वीर मिलेगी?
सूरज की तपिश राह रोक खड़े होने को मजबूर कर रही थी, लेकिन प्रेम की ठण्डी बयार की कल्पना चलने को? दिमाग की अनसुनी कर वह, थक कर उसने निर्णय ले लिया कि आज वह भरी गर्मी में अपने प्रेम को अपने गोद में रख कर दुनिया की सैर पर निकलेगा? हुआ भी यही, किताबों को पढऩे से बीच में ही उसको रोक दिया, जिन्दगी का जो पाठ पढ़ाना था? उसने उसको कॉलेज के गेट पर बुलवा लिया, वह भी ब्लैक-बोर्ड पर लिखे तमाम सवालों का जबाव दिये वगैर, इश्क का जबाव बन वह कॉलेज के बाहर आ गई। और फिर दोनों एक टू-सीटर में बैठ लिये, टू-सीटर वाले ने पूछा कहां जाना है, दोनों ने एक दूसरे की आंखों में कुछ लिख दिया, बेचारा अनपढ़ टू-सीटर वाला कुछ पढ़ नहीं पाया, लेकिन बहरा नहीं था वह सो... प्रेम के कहे शब्द जरूर उसने सुन लिया था, कि जहां चाहों वहां.... ? वह चल पड़ा, उसने अपना ऑटो एक रेस्ट्रारेन्ट के बाहर रोकते हुये पूछा... यहां जाना चाहेंगे, सवाल का जबाव प्रति सवाल में मिला? प्रेमी ने कहा... इतनी जल्दी क्यूं उतार रहे हो? कुछ और दूर चलो...? टू-सीटर वाले ने फिर जो सड़क पकड़ी तो फिर रूकने का नाम नहीं लिया। शायद उसको रोज ही ऐसे वाकये से गुजरना पड़ता था, वो समझ गया, कि रेस्ट्रारेन्ट में नये चेहरे के साथ दस्तक उसको चरित्रहीन बना देगा? और टू-सीटर के अन्दर, अपने प्रेम को गोद में बैठाकर सैर करवाना, अपने प्रेम की नजर में अपने चरित्र को जिन्दा रखना ही नहीं बल्कि तमाम यकीन और विश्वास के अक्षरों से पोषित करने का अवसर भी बन चलेगा? टू-सीटर वाला भी इस प्रेमी को बैक-मिरर को इधर-उधर सरका कर, इनके वर्तमान को पढ़, भविष्य का अंदाजा लगाने लगा? उसे यकीन हो चला था कि जिस प्रेमी ने गर्मी की आड़ में दोनों तरफ के पर्दे लगवा दिये हों? वह गर्मी से डरा था या उन नजरों से जो बीच-बीच में उनका पीछा कर बैठ रहीं थी उससे डर कर? प्रेम ने भी अपने प्रेमी के कांधे पर सिर रख यह सोच लिया हो, कि कौन कहता है दुनिया गोल और बहुत बड़ी है? आज उसकी दुनिया भी टू-सीटर की धुरी पर घूम रही थी, वह अपनी दुनिया का हो जाना ही नहीं, खो जाना भी चाहती थी। उसने अपने सब कुछ की बसीयत अपने प्रेमी को लिखकर सौंप दी। और गवाही वक्त और दौड़ती टू-सीटर की आवाजों ने दे दी। इश्क की खुशबू के बीच अधजले मिट्टी के तेल के धुंए की बदबू न जाने टू-सीटर को कहां धकेल कर ले गयी होगी? सोचता हूं दौड़ता भागता यह प्रेम यकीन से कहां कब तक साथ रह पाया होगा? बिछडऩा तो होगा ही, उनकी बसीयत को सड़क पर उड़ती धूल ने कहां स्वीकार किया था?

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वाह...प्रेम की अच्छी व्याख्या की है आपने...


फालोवर्स की खिड़की कहां है?

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