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ईश्वर मुझे बेहतर इंसान बनाये रखे

Posted by babul on 5/23/2011 12:52:00 PM



ब्लॉग पर आज जो सांझा कर रहा हूं, वह मेरी साहित्यिक रचना नहीं है, और न ही कोई किस्सा-कहानी है, जिसे आत्मसुखाय: के लिये पोस्ट कर रहा हूं? यह एक अन्र्तद्वंद्व है, जो पिछले कई सप्ताह से मैं झेल रहा हूं। शब्दों को जब तन्हाई की रौशनाई वक्त के कागज पर सांझा करती है तो यह बहुत कुछ मन हल्का कर देता है, लेकिन हर बात शब्दों के बहाने कागज पर सांझा कैसे की जा सकती है? मेरे उसूल, कर्म और मर्म, जब साथ-साथ हो चलें, तो सोचा कुछ बातें या अपने विचार ब्लॉग पर ही सांझा कर लंू? यह भी तो मेरे जीवन जैसा भरा-सा दिखता पर खाली पड़ा है? इस बहाने शायद मन कुछ हल्कापन महसूस करे। इन दिनों तारों जितनी तमाम यादें, चांद से ज्यादा बड़ी हो चली है। उन्हें सहेजने या सम्हालने के लिये लगता है, कागज के चन्द टुकड़े नहीं, बल्कि एक पूरा आसमान ही चाहिये होगा? और यह आसमान मेरे नसीब में है या नहीं ऐसे में यह भी तो आसमान में रहने वाले को ही तय करना है?
जी... जीवन में जब कोई अक्षर साथ हो चलता है, और दिल के साजिशन वह जेहन में जब ढाई-आखर लिख बैठता है, तो समूची दुनियां बहुत ही छोटी हो जाती है, यह ढाई-आखर अपने साये में बहुत कुछ किसी का समेट या जोड़ लेता है? लेकिन बहुत कम ऐसे नसीब वाले होते है, जो इस शब्द को अपने जीवन का फलसफा बना बैठते हैं।
सुना है वक्त जीवन में जब भी कोई रिश्ता गढ़ता है, तो उसकी उम्र भी लिख ही देता है और इतनी सी ही उम्र में पढ़े-लिखे या तजुर्बेकार ज्ञानी लोग अपना पूरा जीवन गुजार बैठते है? जबकि लगता है कि पूरा जीवन इस रिश्ते को जीने की लालच में, मैं रिश्ते की उम्र गिनने की जद्दों-जहद में ही जीवन को यादों के सहारे गुजारने पर मजबूर हो चला? हां... अगर दिल को ढाढस बंधाना हो तो भले ही कहा जाये कि वही रिश्ते सदैव रिप्लेस होते हुये आसानी से देखे जा सकते है, जो किसी मतलब या स्वार्र्थ के कांधे के आसरे बनते हैं? जीवन में कभी भी सच्चे और नि:स्वार्थ रिश्ते या उनकी भावनाएं न तो कभी अपना रास्ता बदलती है और न ही अर्थ? यह और बात है कि लोग बदल जायें और इसी के आसरे शब्द अपने मायने खो दे, लेकिन यकीन मानियेगा शब्द कभी-भी अपना रास्ता नहीं बदलते है?
खैर... शिकायत कभी रही ही नहीं किसी से, सो आज भी नहीं है, लेकिन लगता है कि जब उसका होना था तब भी मैं अधूरा था, आज जब वह नहीं है तब भी मैं अधूरा हूं? ब्लॉग पर यह सांझा करने का मन रसरंग (दैनिक भास्कर) में प्रकाशित संडे की पाठशाला गुस्से की कीलों के गहरे निशान प्रेरक-कथा पढऩे के बाद हुआ। जी... गुस्से के दौरान ठोंकी गयीं तमाम कीलें भले ही बाद में उखाड़ ली गयी हों, लेकिन कील गाड़े जाने के निशान सदैव के लिये ही बन जाते है? जीवन में बदलाव हर शख्स को करना चाहिये। मैं भी कोशिश करूंगा कि कभी मुझे कील गाडऩे की जरूरत ही न पड़े ताकि कभी कहीं कोई निशान यह चुगली करें कि मुझे गुस्सा आता है? यह मिन्नत तो कर ही सकता हूं ईश्वर से, पहले की तरह सा-ही वह मुझे बेहतर इंसान बनाये रखे, मैं वैसा ही बने रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा ही बना रहूं, यही कामना है। आपकी टिप्पणी की नहीं, बस आपके दुआओं की जरूरत है, जो मुझे बेहतर इंसान बनाये रख सके।

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आपकी टिप्पणी की नहीं, बस आपके दुआओं की जरूरत है, जो मुझे बेहतर इंसान बनाये रख सके। ......


मेरी दुआएं आपके साथ हैं.


अत्यंत तथ्यपरक एवं सारगर्भित लेख के लिये आपको हार्दिक बधाई।

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