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विश्वकप के सहारे तस्वीर भी बदलेगी...।

Posted by babul on 4/01/2011 05:26:00 PM
रविकुमार बाबुल मैं जब छोटा था और तिस पर उस दौर में अनिवार्य शिक्षा का चलन भी नहीं था, सो शायद इसलिये ही हमारे बड़़े या कह लें पथप्रदर्शक स्कूल की चाहर दिवारी के भीतर चल रही कक्षा में मन लगाकर बेहतर तालीम लेने की सीख देते थे, कच्चे घड़े को आकार देते-देते कई बार वह पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब जैसी सीख देते रहते थे। संस्कार की तो छोडिय़े आज सेक्स को शिक्षा में शामिल करने की जरुरत आन पड़ी है? ...शायद आज बहुत कुछ बदल चला है या कह लें सब कुछ बदल गया है, खेलने के आसरे अब नवाब भी हुआ जा सकता है और पढ़-लिखकर नवाब बनने का हुनर पा बैठे तमाम नवाबों को अपनी तिमारदारी में लगाया भी या लगा पाया भी देखा जा सकता है? जी... नया-नया चलन है, इसी खेल के आसरे बहुत कुछ पाया भी जा सकता है, तो कुछ खोता भी इसी के सहारे ही है। मसलन पड़ौसी मुल्क की अवाम् ने अपने मैदानी सिपाही को हाथ में बैट लिये उसी तरह हारते देखा जब उनकी ही सेना कारगिल में हाथ में बंदूक होने के बावजूद हार गयी थी, या कहें आज के भारतीय मैदानी रणबांकुरों की तरह भारतीय जवानों के आगे भी घुटने टेक दिये थे? जी... तब भी उनका (पाकिस्तानियों का) कुछ खोया होगा, या कहें उनका भरोसा टूटा होगा, और आज भी मैदान में उनका विश्वास स्टम्प की गिल्लियों की मानिंद नहीं उड़ा होगा यह कह पाना नामुमकिन नहीं है, सच उनका यकीन आज यकीनन टूटा होगा?जी... जनाब अनिवार्य शिक्षा के आज के दौर में अब पढ़ायी की स्थिति भी हिन्दी की मौसी उर्दू की तरह हो चली है, जो सरकारी स्कूलों में नौकरी के लिये सिर्फ एक अदद् प्रमाणपत्र की दरकार रखता है, लेकिन उर्दू अल्फाजों की-सी शालीनता नहीं रखता है। खैर... छत्तीस करोड़ की जिस आबादी के आसरे हम अपनी मंजिल की ओर बढ़े और रास्ते में तमाम इतिहास रचते-गढ़ते चले गये। युद्ध भी देखा, और आजादी का जश्न मनाते आजाद हुये पड़ौसी मुल्क को भी देखा। लेकिन हम अपने ही मुल्क के अवाम् की भूख नहीं महसूस सके, उसकी प्यास नहीं पढ़ सके, पढ़ाई को अनिवार्य कर उसे इतनी महंगी कर दें कि देश का भविष्य जब भी कोई ख्वाब बुनें तो वह कॉलेजों के गलियारों से नहीं बल्कि खेल के पिच पर ही पूरी होती दिखलायी दे। जब छत्तीस करोड़ की आबादी एक अरब इक्कीस करोड़ में तब्दील होकर एक बार फिर क्रिकेट के मैदान पर जश्न मनाने की तैयारी में हो तो 1983 में जीते गये विश्वकप के जश्न के बीच उस समय के बजीर-ए-खजाना प्रणव मुखर्जी मुल्क की भूख और प्यास को लेकर कितने संजीदा थे, कि हम एक बार फिर विश्वकप हासिल करने के मुहाने पर आ बैठे हैं, और आज भी मुल्क के बजीर-ए-खजाना प्रणव मुखर्जी ही हैं, इत्तफाक यह भी है कि 1983 और 2011 का कैलेण्डर भी एक ही है। लेकिन मुल्क के भूख और प्यास की स्थिति राष्ट्रीय खेल कहलाने वाले तब की हॉकी की तरह आज भी शर्मसार हो रही है? जी... संविधान के पन्नों पर तमाम वसीयतें हमारे लिये भले ही लिख कर छोड़ी गयीं हों, लेकिन वह हकूक और अधिकार राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव और राजनीतिज्ञों की लालच के चलते हमें मिल ही नहीं सके।जी... कितनी अजीब बात है, इस देश में खेल कितना मायने रखता है, कि हर शर्मसार कर देने वाली घटना के पीछे खेल लिखकर उसे गढ़ा-पढ़ा जाता है, मसलन फलां नेता का खेल या भ्रष्टाचार का खेले ...आदि-आदि। सो... अगर वानखेड़े में पानी की बोतल ले जाने पर प्रतिबंध सुरक्षा कारणों से लगाया गया है तो नीति निर्धारकों को पता है कि तिरेसठ वर्षों से भूख और प्यास सहन करने वाली आबादी सूखे कण्ठ रहने की आदि हो चली है? जी... खेल का जादू होता क्या है? यह सभी के सर चढ़ कर बोलता है। इसके लिये मुल्क के प्रधानमंत्री ही नहीं फुर्रसत निकालते है, बल्कि विधायिका और शासकीय कार्यालयों में भी आधा दिन काम बंद का फरमान जारी हो जाता है? जी... यह अलग सवाल है कि राष्ट्रीय खेल हॉकी के लिये इतना समय प्रधानमंत्री क्यों नहीं निकाल पाते है, समझना ही नहीं पढना भी होगा बैट और स्टिक को? जब देश में अपने हक के लिये मजदूर या कामगार हड़ताल पर चले जायें तो वह मुल्क के विकास का रोड़ा मान, अवैध मान लीं या कह दी जाती है, लेकिन पूरा मुल्क जब आपसी सहमति से विकास का पहिया जाम कर दे तब क्या कहियेगा? जी... जनाब, शिक्षा को अनिवार्य कर देने के बावजूद ग्वालियर में ही नगर पालिक निगम ने एक स्कूल को चल रही परीक्षा के दौरान ही खाली करवा कर, जमीदोंज कर दिया, जी... यहां बन्दरों का केज (पिंजड़ा) बनाया जायेगा, बन्दरों (उछल-कूद करते बच्चों को अधिकांश लोग प्यार-दुलार में बंदर भी कह देते हैं) को इंसान बनाने की कोशिश को तार-तार करके। अनिवार्य शिक्षा का यह हश्र होगा, कभी सोचा नहीं गया होगा?जी... विद्युत मण्डल परीक्षा को लेकर इतना संजीदा कभी नहीं दिखा, उसे कटौती करनी थी, उसने मनमुताबिक की, लेकिन खेल के जश्न के जूनून में उसने कटौती का अभियान स्थगित कर दिया, तब एक बार फिर लगा कि खेल के सहारे ही नवाब बना जा सकता है, पढ़ लिखकर नहीं। खेल का महत्व कितना है इसे साबित करने के लिये तमाम उदाहरण आपको मिल जायेंगे।जी... हम तो यही कहेंगे कि विश्वकप हासिल करके गौरान्वित होने में हमें परहेज या गुरेज कतई नहीं है, लेकिन एक अरब इक्कीस करोड़ की आबादी में से 75 फीसदी आबादी को एक जून की सूखी रोटी मिले और गंदा ही सही पीने को पानी मिल जाये तो यह विश्व में हमें शर्मसार होने से बचा लेगा। उम्मीद है कि विश्वकप के सहारे क्रिकेट की तकदीर ही नहीं, मुल्क के भूखों-प्यासों की शर्मसार करती तस्वीर भी बदलेगी?

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सटीक बात कही है आपने...

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