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लाचारगी और बेचारगी के बीच रेंगती सरकार

Posted by babul on 1/28/2011 04:05:00 PM
रविकुमार बाबुल

दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में जिस तरह गणतंत्र का जश्न सरकारी महकमें में डिप्टी कलेक्टर के उंचे ओहदे पर बैठे शख्स को जलाकर तथा राहुल के दूसरे भारत में निम्नवर्ग की नाबालिग किशोरी के साथ सामूहिक कुकृत्य के बाद उसकी हत्या या फिर एक शिक्षिका को यौन शोषण के बाद आत्महत्या के रुप में मनाया गया और इन सब के बीच देश के नेताओं ने या कहें राजनीति को रखैल बना रखने की हैसियत वाले भले ही इस मुगालते में हों कि तिरंगे ने खुद को अपमानित होते-सा महसूस न किया हो, ऐसे में तिरंगे की बेबसी को महसूसा जा सकता है। लेकिन इंडिया गेट से रायसीना हिल्स तक कदम ताल बजाते और मिलाते देश के जाबांजों के बीच ही मुल्क पर शासन करने की हैसियत जुटाये बैठे मुट्ठी भर लोग या कहें अपने-अपने सूबे की कमान सम्हाले सत्ता का बाजार सजाये बैठे, सत्ता के मठधीशों का अपराधियों या भ्रष्टाचारियों के साथ जिस गठजोड़ का परत-दर खुलासा कर इसे खोलने का दुस्साहस देश की सर्वोच्च अदालत जुटाये बैठी है, मुल्क की सर्र्वोच्च अदालत के सवाल के बाद भी सरकार सीधे दबाव देने से बचती ही नजर आयी? शायद सच तो यह है कि गणतंत्र के जश्न के दौर में जिस तरह पी.एम. से लेकर सी.एम. तक चिन्तित दिखे और गणों के हितैषी बनने-दिखने के प्रयास में जुटे रहे उससे यह संदेश भी सुनते हुये राष्ट्र ने जन-गण-मन के बीच महसूस किया कि जनाब हम सत्ता चलाते है, लेकिन अपराधियों या भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने की जुर्रत कर नहीं सकते हैं? हम नीति तो बनाते है, लेकिन उन्हीं नीतियों पर चलने का दुस्साहस कर हम, हमें सत्ता तक पहुंचाने वाले अपराधियों या भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही नहीं करना भी हमारी मजबूरी है? जी... जनाब... मजबूरी, पी.एम. से लेकर देश के तमाम सूबे के सी. एम. तक की यह आज के अवाम की तरह ही महंगाई के दौर में जिंदा बने रहने या कहें कि जिंदा रहने की-सी मजबूरी है? मसलन मुल्क के प्रधानमंत्री हों या किसी सूबे के मुख्यमंत्री दोनों की स्थिति और हस्ती अब यह रही ही नहीं है कि मुल्क की अवाम मन से उन्हें आज अपना हितैषी मान ले या स्वीकारे? तमाम भ्रष्टाचार के बहाने जमा काला धन के मालिकों का नाम सरकार उजागर नहीं कर सकती या कहें करना ही नहीं चाहती है, यह बेचारगी पिछले दिनों प्रणव दा के बयानों में दिखी, जी... जनाब, विश्व के बड़े लोकतांत्रिक देश के वित्तमंत्री हैं वह? ऐसी ही लाचारगी बीते दिनों सी.व्ही.सी. की नियुक्ति पर मुल्क की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुंच, देश के एटार्नी जनरल द्वारा सरकार के पक्ष में यह दलील रखने में देखने को मिली कि सी.वी.सी प्रमुख की नियुक्ति के पूर्व उन पर दाग है, सरकार को इसका इल्म ही नहीं था? जी... जनाब... मुल्क की 70 फीसदी अवाम अब यह कैसे उम्मीद जगाये रखे कि उसकी दुर्दशाओं पर सरकार की नजर रहती है? मसलन सरकार की नजर कालाधन पर है, उसे सहेजने वाले धुरंधरों के नामों पर है, लेकिन वह बतला नहीं सकती है? विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सी.वी.सी. प्रमुख की नियुक्ति पर जब थॉमस पर लगे दाग को दिखलाया तो कमेटी के सदस्य पी. चिदम्बरम ही नहीं, मुल्क के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी दाग तो अच्छे हैं की तर्ज पर सुषमा के विरोध को खारिज करते हुये देश के तमाम भ्रष्टाचारियों को ही नहीं अपनी सरकार के मंत्रियों के दागदार होने के बावजूद उन्हें दागदार दिखने से बचाने के लिये सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी। अब सरकार की तरफ से एटार्नी जनरल कह रहे है कि सरकार को पता ही नहीं था कि थॉमस दागदार है? तब यहीं से जो प्रश्न उभरता है कि क्या विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर में बैठने वाले या कहें सबसे ज्यादा भ्रष्टाचारियों के हित को ध्यान में रख कर फैसले लेने वाले तंत्र के इस गठजोड़ के जरिये मुल्क के अवाम की भूख से मरने या उनके आत्महत्या करने की बात अगर सवाल बन कर उभरी तब, देश का सड़ता अन्न गरीबों में बांट दो की नसीहत देने वाली अदालत से यह सरकार अपने एटॉर्नी जनरल के जरिये यह न कह बैठे कि मुल्क के लोग भूख से मर भी रहे है? उन्हें आज तलक ऐसी कोई खबर मिली ही नहीं है?जी.....मुल्क में सत्ता-सुख भोग रही सरकार का आज यही चरित्र हो चला है। जी.....जनाब शांति की कवायद में लाल चौक में तिरंगा नहीं फहराया जा सकता है, लेकिन अशांति और भ्रष्टाचार के बीच सरकार चलती रहे इसके लिये मनमोहन सिंह पश्चिम बंगाल में ममता के माओवादी प्रेम को कटघरे में खड़ा करने का दुस्साहस नहीं जुटा पाते हैं? अदालत जैसे हरकारे की लताड़ खा-खाकर भी वह ममता या पवांर का पोर्टफोलियो नहीं बदल पाते हैं, जनता को महंगाई, अपराधियों या भ्रष्टाचारियों से निजात नहीं दिलवा सकते हैं? जी... भाजपा और आर.एस. एस. पर धार्मिक उन्माद फैलाने का मुल्लमा भले ही चढ़ा हो पर एक बात साफ हो चली है कि अब इस मुल्क को सरकार नही विभिन्न धर्मो की अदृश्य शक्तियां ही चलाती प्रतीत हो रही हैं?

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