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जश्न के दौर में गुलाम बनने की-सी पीड़ा?

Posted by babul on 1/21/2011 03:27:00 PM
जश्न के दौर में गुलाम बनने की-सी पीड़ा?

रविकुमार बाबुल

जनाब जश्न कोई भी हो इसके मिले आमंत्रण पर यह खुद को इठलाने पर मजबूर करता है तो और किसी को आमंत्रित करने पर यह जश्न खुद को गौरान्वित महसूस भी करवाता है? जी... जनाब कुछ ऐसा ही होता है जश्न का मिजाज? जी... इसी जश्न के जूनून में जब राष्ट्रीयता का बोध हो चले..... या कहें कि अस्मिता के नाम पर राष्ट्रीयता को सर्वोपरि मान कर, यहां तक की शांति को भी ताख पर रख, जब यह जश्न मनाने भीड़ लाल लगाम के बहाने वोटरों पर सर्वाधिक लगाम कसे रह सकने वाले जिस रविन्द्र नाथ टैगोर की जन्मभूमि तथा मदर टेरेसा की कर्मस्थली रहा पश्चिम बंगाल से निकल जब लाल चौक पर जाकर तिरंगा फहराकर आजादी के जिस जश्न को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाना चाहती है, और ऐसे में ही कश्मीर के मुख्यमंत्री तथा केन्द्र में सत्तासुख भोग रही कांग्रेस एक सुर मिलाते हुये इसे ही शान्ति के लिये खतरा मान बैठ उस तिरंगे को लालचौक पर नहीं फहराने का फरमान सुना दें तब विश्व में सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क का तमंगा लटकाये देश की अवाम के उठे सवाल पर क्या कहियेगा? जी... कुछ कह ही नहीं सकते हैं, कर भी नहीं सकते, जब तिरंगा फहराने पर मनाही हो शान्ति की खातिर तो क्यूंकर कोई किस तिरंगे के सामने 52 सेकेंड में जन गण मन गाकर देश के लिये अपना जीवन दांव पर लगा देने वाले शहीदों को ही याद करे या कहें कि याद रखें? बहुत मुश्किल है ऐसे में शहीदों को भूला देना और इन सत्ताधीशों को याद करते रहना?
अलगाववादी ताकतों के सर-परस्त हो चला भारत का अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर की राजनीति या फिर कीचड़ में खिल सकने वाले फूल के चिन्ह वाले दल, जो महंगाई रहित सुशासन और पारदर्शी शासन देने के बहाने सत्ता कब्जियाना जानती भी है और चाहती भी है, मसलन बिहार में भाजपा विधायक सुशासन के बहाने मां ही नहीं उसकी बेटी की भी अस्मिता अपनी मुट्ठी में कर तार-तार करने के चाह के दुस्साह में अपनी जिंदगी गवां बैठता है, तो उसी दल में कर्नाटक के मुख्यमंत्री अपने पद पर अब तक क्यों बने हैं। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद सवाल अनुत्तरित है। शायद यह ही सुशासन की इस दहलीज की पहली सीढ़ी है। खैर......महंगाई कांग्रेस राज में बढ़ी है तो जश्न भाजपा का मनाना लाजिमी है? चीन अरूणाचल और कश्मीर के लिए स्टेपल बीजा जारी करता है तो भाजपा के तल्ख सवाल सरकार को चैतन्य नहीं कर सकते है? मनरेगा के दौर में माओवादी बेरोजगारी और भूख के बीच अपनी उंगलवी ट्रिगर पर ले जाते है तो जश्न किसको मनाना चाहिये? उसको जो सरकार में शामिल भी है और माओवादियों के इस कृत्य के प्रति अपनी सहमती भी जतला रही है ताकि निशाना उसकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर नहीं साधा जाये भले ही समूची सरकार निशाने पर हो चले? क्या कहियेगा? जश्न किसे मनाना चाहिये..... उन वोटरों को जिन्होंने इसे चुना या उनको जिन्होंने अपने कत्र्तव्यों से किनारा किया और यह स्थिति हो चली है कि आप लालचौक पर तिरंगा फहराकर गणतंत्र दिवस पर आजादी का जश्न नहीं मना सकते हैं? फिर भी तिरंगा न फहराने का जश्न मनाने के तमाम बहाने मौजूद हैं और जश्न मनाने वाले भी?
जश्न के इस दौर में यही कहा जाये कि लाल चौक पर पाकिस्तानी ध्वज तो फहराने की कोशिश होने दी जा सकती है लेकिन राष्ट्र का अभिन्न अंग रहा यह प्रांत इसकी दुविधा झेलते हुये भी खालिस शांति के बहाने तिरंगा फहरा सकने की इजाजत नहीं दे सके, तो यहीं से कई सवाल उठ खड़े होते है, जो राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी से केन्द्र में बैठे गृहमंत्री समेत समूची सरकार को जिस कटघरे में खड़ा करते है, वहां से इनका बाईज्जत बरी होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। वैसे पार्टी कोई भी हो.....तिरंगा लाल चौक पर लहरा कर वह जिस जश्न को मनाना चाहती है उसके हम भी कायल है, यही नहीं हर वह शख्स जो चाहता है, अगर कश्मीर की सरकार मानती है कि तिरंगा लहराने के बहाने वहां अशांति फैलेगी तो उमर साहब सिर्फ आप से ही नहीं, आपके फैसले में शामिल केन्द्र सरकार को भी मुल्क पर शासन करने देने की ईजाजत छीन लेनी चाहिये कि आखिर अमन की खातिर अपने मुल्क को गुलाम बनने की-सी पीड़ा कौन चाहेगा, जश्न के इस दौर में?

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