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Posted by babul on 10/11/2010 09:55:00 AM
राहुल जी, ... सिपाही सरकार नहीं बनाता है

रवि कुमार बाबुल
जिसका अंदेशा था वही हुआ। इसी स्तम्भ के अन्तर्गत मैनें राहुल को राजकीय अतिथि का दर्जा देने की राज्य सरकार की कूनीतिक मंशा और राहुल की युवा हो चली नेतृत्व की जिम्मेदारी की चाहत के चलते, kउचेह सवालों को बोया था। आज युवा सांसद राहुल गांधी अपने वタतव्यों से इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ खण्डपीठ के अयोध्या मसले पर आये फेसले के साथ अमन और साmप्रदायिक सौहार्द के बीच अंगड़ायी ले रहे राज्य की उसी जमीन पर सिमी (आतंकवादी संगठन) और .. की तुलना आपस में कर दी? राहुल ने राजकीय अतिथि केञ् दायित्व और कर्तव्यों को भूल, शायद राजनीतिक लाभ केञ् लिये एक ऐसी फसल को प्रस्ड्डुञ्टित और पल्लवित होने का मौका दे दिया, जो देश को आज तलक या कह लें आजादी केञ् बाद से ही परेशान किये हुये है?
खैर....राजनीतिक मंचों से खुद को आम जनता का दिल्ली में सिपाही बतलाने वाले राहुल शायद यह नहीं जानते हैं या नहीं जानना चाहते हैं कि एक सिपाही की हैसियत इस मुल्क में सरकार बनाने की कभी रही ही नहीं है, वह सरकार केञ् करीब रहने की हैसियत तो रख सकता है? सुरक्षा केञ् मद्देनजर, वह उसका सुरक्षा कवच हो सकता है? लेकिन राहुल जी सिपाही सरकार कभी बना ही नहीं सकता है? शास्वत सत्य तो यह है कि सरकार सदैव राजनीतिज्ञों की रखैल रही है और उसे स्वीकारने / अस्वीकारने या कह लें चलाने या न चलाने का ड्डैञ्सला नेता ही करते रहे हैं? यह अलहदा बात है कि सマय समाज में किसी पत्नी की सी भूमिका में सदैव आम मतदाता ही रहा है? ऐसे में राहुल जी अगर आप सिपाही हैं तो सिर्ड्डञ् आपको विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और सुरक्षा की जुबान बोलनी थी, लेकिन आपकी दृष्टि सदैव पार्टी को साा केञ् सिंहासन पर बैठाये रखने की रही है, आप जुबानी जमा-खर्च में भले ही सांसद सिपाही हों लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि आप एक ऐसे नेता हैं जो युवाओं केञ् जोश केञ् दम पर कांग्रेस केञ् ही बुजुर्ग नेताओं को हाशिये पर लाकर ठिकाने マाी लगाना चाह रहे हैं, और साा पर マाी काबिज रहना या होना चाहते हैं? तो जनाब, राहुल जी, युवाओं केञ् दम पर देश तब ही रヘतार पकड़ सकता है जब बुजुर्ग नेताओं केञ् अनुभव केञ् सहारे तय लकीरों को पकडक़र आगे बढ़ा जाये? और अगर इन लकीरों को नजर अंदाज कर राजनीति करने की कोशिश की जायेगी तो वही होगा जैसा राहुल जी आपकेञ् सिमी और आस.एस.एस. केञ् रूञ्प में आये बयान की रोशनी में देखा, सुना और समझा जा सकता है कि यह रास्ता किधर जा सकता है?
वह युवा हैं, इसलिये राहुल मंच से अगर यह कहते हैं कि युवाओं को राजनीति में आना चाहिये, उठा कर भगा दूंगा, ड्डैंञ्क दूंगा जैसे शाホदिक अलंकरण वाली भावनाएं प्रकट करते हैं तो यकिन मान लीजिये ऐसे में वह सिपाही हो ही नहीं सकते हैं, जो दिल्ली में होने या रहने की बात करता हैं, वह विशुद्ध नेता होगा? तिस पर राहुल की मजबूरी यह है कि वह सिपाही तो दिखना चाहते हैं और नेता भी बने रहना चाहते हैं? राहुल ने आर. एस. एस को लेकर जो बयान दिया है उससे तो यह साफ हो चला है कि राहुल सिमी हो या फिर आर. एस. एस. इसे तो छोडिय़े, वह खुद सिर्ड्डञ् कांग्रेस को भी ठीक तरीकेञ् से नहीं जानते हैं? वह तो कांग्रेस को एक घराना मान, और किसी औद्योगिक घराने की तर्ज पर ही इसे चलाना भी चाहते हैं, और उसे लाभ पहुंचाना भी। ऐसे में राहुल से कौन कहे कि जिस आर.एस.एस की तुलना आप सिमी से कर रहे हैं उसी आर. एस. एस केञ् हेडगेवार कभी कांग्रेस में सर्वमान्य शチसियत भी रहे हैं? तथा ऐसे में त्त्भ् वर्षों की राष्ट्रवादी विचारधारा की धारणा की तपस्या उसे सिमी केञ् करीब तो नहीं ले जा सकती है? वैसे भी राहुल जी सिमी और आर. एस. एस. में क्त्त् डिग्री का अंतर है। यही वजह है कि जब भ् अगस्त ख्त्त्िं को सिमी से प्रतिबंध हटाया गया तो म् अगस्त ख्त्त्िं को फिर कोर्ट केञ् आदेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया और अदालत भी आपकी पार्टी की ही सरकार गयी थी, लेकिन क्ऽऽख् में दस राज्यों में संघ की सभी शाखाएं प्रतिबंधित कर दी गयीं लेकिन ट्रिホयूनल ने इस पर से प्रतिबंध हटा लिया और केञ्ंद्र सरकार सिमी की तरह प्रतिबंध जारी रखने केञ् लिये अदालत में अर्जी लेकर नहीं पहुंची, इस से यह तो साफ या साबित तो हो ही जाता है कि केंञ्द्र ने सरकार केञ् ही अंग केञ् रूञ्प में कार्यकर रहे ट्रिホयूनल केञ् ड्डैञ्सले को अदालत में कोई चुनौती नहीं देकर इसे स्वीकृञ्ति कहें या सहमति दी थी, जिसे आज राहुल सिमी से जोडक़र इसे चुनौती देने की मुद्रा में आ खड़े हुये हैं?
राहुल को राजकीय अतिथि का दर्जा देकर शिवराज सिंह जिस राजनीति केञ् पाठ को राहुल को पढ़ाना चाहते थे, वह उसे सीख पाये या नहीं यह तो समय बतलायेगा? लेकिन वह यानि शिवराजसिंह यह मानते हैं कि आर.एस.एस देशभタति का पाठ पढ़ाता है, युवाओं को चरित्रवान और ईमानदार बने रहने की प्रेरणा भी देता है इस विचार से सभी इタतिफाक रखते होंगे। छोड़ उनको जो सिमी की आर.एस.एस से तुलना कर रहे है।
फिलवタत इस दर्द का मर्म यही है कि ऐसे में एक सिपाही को नेता की भूमिका में आने से बचना होगा? यही राजनीति की आवरण कथा भी है और समय की मांग भी?

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