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Posted by babul on 8/23/2010 11:22:00 AM

मामला चौहान मामा के संज्ञान में नहीं, कप्तान को फुर्सत नहीं
रवि कुमार बाबुल
राजनीति से अलहदा एक मामला खाकी को लेकर आया है, यूँ तो पुलिस का जिम्मा शहर में कानून व्यवस्था को अक्षुण बनाये रखने और अपराधियों की नाक में नकेल डाले रखने का होता है लेकिन अब पुलिस की वर्दी भले ही वही हो, लेकिन कार्य की शैली बदल रही है, रेत ढोते टै्रタटर-ट्राली, ट्रकों और तमाम वाहनों से आमतौर पर वसूली करते दिख जाने वाले चेहरे सक्रिय rहैं?
शहर केञ् कप्तान केञ् साथ एक किस्सा आपको भी सुनाते हैं, कप्तान साहब शर्त यह है कि थाने केञ् किसी व्यタति केञ् खिलाफ कोई कार्यवाही न की जाये और बिगड़ती कानून व्यवस्था पर चीखते-चिल्लाते विपक्षी दल का मुंह बंद रखने की ऐसी सक्रिञ्यता मध्यप्रदेश पुलिस की बनी रहे, जब शर्त मंजूर है ही तो सुनें, कप्तान साहब।
तीन लाख रुपये की चोरी होती है, पुलिस की सक्रिञ्यता केञ् चलते। चोर माल समेट कर जब भागते हैं तो चोरी कर ले जाये जा रहे एक खराब मोबाइल, जिसकेञ् यहां चोरी हुयी है उसी केञ् यहां गिर जाता है। आलसी चोर उड़नपरी पी.टी. ऊषा को दौड़ में पछाड़ने की मंशा लिये खराब मोबाइल उठाये बिना ही दौड़ लगा बैठते हैं? चोरी केञ् बाद पुलिस मामला दर्ज कर पड़ौस में रहने वाले किसी परिवार में गमी हो जाने की तर्ज पर मातमपुर्सी करती है तथा रोजनामचे में मामला दर्ज कर अस्थि-विसर्जन सा आनंद पा लेती है और फिर लग जाती है, ट्रक-टै्रタटर में।
इोफाक से यह खराब मोबाइल जिसकेञ् यहां चोरी हुयी थी, उसकेञ् यहां ही काम करने वाले व्यタति को मिल जाता है? खराब मोबाइल, खराब आर्थिक स्थिति, पैसों की जुगाड़ कर मोबाइल सुधरवा लिया जाता है। बस एक घंटी बजती है और पुलिसिया कार्यवाही शुरूञ् हो जाती है?
उタत व्यタति पर दबाव यह है कि पुलिस अपनी पीठ थपथपाये इसलिये वह तीन लाख की चोरी कबूले और उस व्यタति की मजबूरी है कि तीन लाख केञ् सामान की बरामदगी दिखलाये तो कहां से दिखलाये? ले-देकर लाखों केञ् कर्जे केञ् बावजूद बेलदारी कर गुजर-बसर कर रहे इसकेञ् पूरे कुञ्नबे में तीन लाख का सामान पुरातत्व वाले भी नहीं निकाल सकते हैं तब यह तो ठहरी पुलिस, जहां अपनी गुण्डागर्दी, मनमर्जी केञ् अलावा सबूत और साक्ष्य की भी जरूञ्रत होती है। खैर, मानवाधिकार प्रतिबंधित इस क्षेत्र में पुलिसिया अंदाज में गद्दे में भरी रुई की तरह इन्हें धुना गया और शरीर को धुन-धुनकर टुनटुन केञ् समकक्ष लाने की कोशिश की गयी। पर मामला पुलिस को खुद की पीठ थपथपाने लायक नहीं बन सका और अंत में सुनने में आया है कि एक ही परिवार केञ् तीन लोगों को जिसकेञ् यहां चोरी हुयी थी, उसकेञ् ही आग्रह पर छोड़ा गया है? लेकिन कप्तान साहब यह तय है जो हुआ सो आपकेञ् विभाग (पुलिस महकमा) की विभागीय शिष्टाचार और परミपरा रही होगी?
कप्तान साहब, बड़ा सवाल जिसका जवाब आपसे अपेक्षित है कि सर्व-स्वीकार्य मामाजी (मध्यप्रदेश केञ् मुチयमंत्री शिवराज सिंह) केञ् रहते हुये थाने में पदस्थ लोगों की यह जुर्रत कैञ्से हो गयी कि वह थाना में अर्द्ध-रात्रि में ही महिला पुलिस की गैर मौजूदगी में बयान लिखने केञ् बहाने बालिग और अविवाहित युवती को बुलाये? अंततः तमाम टालमटोल केञ् बावजूद उसे भोर (जानते हैं न कप्तान साहब सुबह) भ्.फ् बजे थाने केञ् चौखट पर दस्तक देनी ही पड़ी है उस युवती को? खैर वैलेंटाइन-डे और ड्ड्रैञ्ण्डशिप-डे पर समाजगीरी करने वाले संगठनों केञ् लिये शायद यह मामला उनकेञ् हस्तक्षेप केञ् अयोग्य हो और महिला आयोग का वजूद है प्रदेश में? खैर मामला था, थाना की सीमा होती और कप्तान साहब आपकेञ् मातहतों को मिला पॉवर भी? तो फिर किसी केञ् साथ कुञ्छ भी किया जा सकता और करवाया जा सकता है? लेकिन जनाब, इसका अंत कानून की किस धारा की आ-ब-रूञ् से खिलवाड़ कर किया गया है बतलाइएगा जरूञ्र? साथ ही यह भी कि बालिग, गरीब तिस पर अविवाहित युवती केञ् बयान की अर्द्ध-रात्रि या यूं कहें कि भ्.फ् बजे जरूञ्रत タयों पड़ी? बयान किसने लिये? महिला पुलिस थी कि नहीं? तमाम सवाल भी जनाब आपसे जवाब चाहते ही होंगे? बावजूद इसकेञ् कि यह मामला अभी तक मामाजी यानि मध्यप्रदेश केञ् मुチयमंत्री शिवराज सिंह चौहान केञ् संज्ञान में नहीं आया है और कप्तान साहब आपकेञ् पास विधि प्रदा कार्यवाही करने की ड्डुर्ञ्सत भी नहीं?
वैसे भी कप्तान साहब, आमिर ने अगली फिल्म बनायी तो यह प्लॉट (कहानी का आधार) उनकेञ् काम आयेगा? हम चाहते हैं कि पीपली लाइव की तरह आपकेञ् थाना केञ् कर्मचारी इसमें सजीव अभिनय भी करें और आप टेकनपुर केञ् श्वान (कुञा) प्रशिक्षण केञ्न्द्र से श्वान (कुञा कहना अच्छा नहीं लगता है) बुलवाकर थाना का पता करें या करवायें। फिर भी दिタकत हो थाना ढूंढने में कि सभी थाने एक से चरित्र वाले हैं तो मुझे याद कर लीजियेगा। आपको बतला दूंगा कि यह थाना आपकेञ् विभाग और सरकारी कागजों में दर्ज है विश्वविद्यालय थाना केञ् नाम से।


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