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Posted by babul on 8/23/2010 12:39:00 PM

शिव को अनूप के लिए बहानी होगी सत्ता की गंगा
- रवि कुमार बाबुल
ग्वालियर से लेकर भोपाल तक भूचाल ला देने वाली बेला गांव की घटना ke मर्म को अब ऐसी सियासी मलहम लगायी गयी है कि जोड़-घटाओ या गुणा-भाग कुछा भी करो नतीजा, बे-नतीजा यानि सिफर ही रहेगा। शायद तभी अंग्रेजों की मानिंद ड्डूञ्ट डालो और राज करो की तर्ज पर लगता है कि आने वाले समय में बेला गांव संघर्ष समिति अब आपस में ही संघर्ष केञ् रास्ते चल पड़ेगी। अनूप मिश्रा की शिवराज सिंह से मुलाकात और उसकेञ् बाद ही प्रदेश ke गृहमंत्री नारायण सिंह नारद की भूमिका में आकर मंत्री लोक ke शिव का फरमान सुना गये। वह सहज ही किसी बड़े से बड़े जादूगर ke तिलिस्म को मात देने ke लिये काफी था। गृहमंत्री जिस तरह आंधी की तरह आये और तूफान की तरह चले गये उसको देख कर तो ऐसा ही लगता है। भीकम केञ् भाई को नौकरी वह भी संविदा शिक्षक की और मुट्ठी भर लोगों को कुञ्छ मुआवजा? रही बात रास्ता खोलने की तो एक माह की मौहलत मांगी है सरकार ने दरबार में। इस विवाद ke तूल पकड़ने पर सरकार और पद गवां चुकेञ् पूर्व मंत्री ke निकट हो चले संघर्ष समिति ke कुञ्छ पदाधिकारियों ने संघर्ष स्थगित करने का निर्णय ले लिया। बेला गांव में रास्ते ke लिए शहीद हुये भीकम ने राजनीति की वह चौसर अनजाने में ही बिछाकर रख दी, जिस पर राजनीतिज्ञों द्वारा शह और मात ke लिए खेल खेला जाने लगा है और कभी चाल शिवराज चलते हैं अनूप से इस्तीफा मांगकर तो कभी अनूप उमा की वापसी को लेकर अढ़ाई (घोड़ा जो शतरंज ke खेल में अढ़ाई घर चलता है) घर की चाल चल लेते हैं। बेला गांव मामले को लेकर प्रदेश ke कद्दावर मंत्री अनूप मिश्रा को मंत्री पद की कुर्ञ्सी छोड़नी पड़ी और विधायक केञ् पद पर वह काबिज रहे। जनता भले ही भूल गयी कि राजनीति में एक विधायक का रसूख タया होता है? और विधायक केञ् タया मायने होते हैं? राजनीति केञ् पंडित तो जानते ही हैं कि एक विधायक की हैसियत यह होती है कि उसकी बजायी डुगडुगी पर कभी-कभी पूरा मंत्रिमंडल भांगड़ा और भरतनाट्यम्‌ करने पर मजबूर हो सकता है। शायद यही वजह रही थी कि अनूप मिश्रा ने शिवराज सिंह केञ् कबीने से इस्तीफा तो दिया था लेकिन विधायकी सेञ् इस्तीफा इसलिये देना जरूञ्री नहीं समझा या उनकेञ् अंतर्मन ने इजाजत नहीं दी タयोंकि उसका इस्तेमाल आने वाले समय में अपनी बेहतरी केञ् लिये किया जा सकेञ्। बेला गांव की घटना के बाद अनूप मिश्रा की भले ही राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी हुयी हो और वह भी अपना चरित्र भारत केञ् भ्रष्ट और भाई-भतीजावाद केञ् हिमायती अधिकांश नेताओं से अलग नहीं रख पाये हों, अलग बात है लेकिन यह उनका रसूख और जलवा ही माना जायेगा कि अपनी जेब में मुट्ठी भर विधायकों की राय रखकर, उमा भारती की पार्टी में वापसी को लेकर तेजी केञ् साथ प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर घटे घटना क्रञ्म केञ् मद्देनजर वह उमा की वापसी को लेकर जो भी तय करेंगे, उसकेञ् आगे शिवराज सिंह को अनूप के लिए सत्ता की गंगा को प्रदेश की राजनैतिक धरती पर लाना ही होगा? बेला गांव केञ् पीडि़तों को न्याय मिले या न मिले इसका इतना मायने आज केञ् राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में नहीं है कि जितना नारी शक्ति की नुमाइंदगी कर रही उमा भारती को पुनःपार्टी में शामिल किये जाने से रोकना? शिवराज जानते हैं कि ग्वालियर-चミबल क्षेत्र में उमा भारती का タया कद रहा है? उस कद को बौना मानने की भूल वह कतई नहीं कर सकते हैं लेकिन राजनीतिक दीवार पर वह एक ऐसी परछाइर्ं का परिदृश्य तो इस क्षेत्र में प्रकट कर ही सकते हैं जो उमा केञ् कद को समूचा लील ले और जब नजर दौड़ायें तो इसकेञ् लिये जिस शチस का नाम उभरता है या यूं कहें रह जाता है वह है अनूप मिश्रा का। शिवराज सिंह यह भली-भांति जानते हैं कि प्रदेश भाजपा की राजनीति में उमा की वापसी रोकने में अनूप की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है और अनूप भी जानते हैं कि यही उミदा वタत है कि उमा केञ् बहाने ही सही परिजनों को बेला गांव मामले से बे-दाग बचा, अपने लिए राजनीति की नई इबारत लिख ली जाये। ऐसा ही होगा, यह दावा तो नहीं किया जा सकता है, पर यकीनन करीब का भी ऐसा कुञ्छ होता है तो यह राजनीति किन रास्तों से और किस रस्सी को पकड़ आगे बढ़ती है, आने वाले दिनों में साफ हो जायेगा। लेकिन इस खेल में किसी मौसी केञ् कोठे पर बंधक बना कर रखी गयी जवान-सुन्दर युवती की मानिंद आज राजनीति भी छटपटा रही है और बाहर से उजले कलफ लगे पोशाक में कतार लगी है कि इस बार नथ उतारने का मौका उन्हें ही मिले।


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