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Posted by babul on 8/23/2010 12:49:00 PM
बेला गांव के बहाने ही सही, किसी को तो न्याय मिलेगा?
- रवि कुमार बाबुल
बेला गांव में हुये जुर्म केञ् बाद चली जांच-पड़ताल को देखकर तो अब लगता है कि इसकेञ् निपटारे की अंतिम बेला भी अब आ चली है। स्वच्छ सरकार देने केञ् हिमायती मध्यप्रदेश केञ् मुチयमंत्री शिवराज सिंह चौहान केञ् कबीने में शामिल स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा केञ् परिजनों ने अपराध को अंजाम देकर क्षेत्र का जो माहौल अस्वस्थ कर दिया है वह तो भला हो अफसरशाही का जिनकेञ् अथक प्रयास और मशタकत से रसूखदार मंत्री केञ् गुगर्र्ेे मिल-जुलकर मामले की लीपापोती कर मामले को शांत करने में काफी हद तक सफल रहे हैं । यह मामला अपराधिक कम और राजनीतिक ज्यादा हो चला था और जो लोग राजनीति कर रहे हैं उन्होंने भी अपना नफा-नुकसान का आंकलन करकेञ् ही पीडि़तों केञ् अश्रु पोंछे। भविष्य में जिन्हें वोट की दरकार है वह बेला गांव की पगडंडियां नाप आये और जिन्हें अपना कुञ्छ फायदा इस मामले में नजर नहीं आया सो उन्होंने लौहपथ गामिनी से अपना शहर, अपना घर लांघ, वीरांगना केञ् शहर में ही जाकर दम लिया। भई, यही तो खालिस राजनीति है। राजनीति केञ् कई मायने हैं, मसलन वोट को एक तरफ रख भी दें तब ऐसे नेता भीड़ में दिखलायी देने लगते हैं जो शहर केञ् बड़े कद वाले नेता से भी अपना कद बड़ा करने की जुगत में हैं। वह इस मामले में मान-न-मान, मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर हस्तक्षेप कर राज्य स्तरीय पहचान बनाना चाहते हैं। ऐसे में बेला गांव की जमीन भले ही फसल केञ् मामले में उतनी मुआफिक अब न रही हो, लेकिन राजनीति की खेती अचानक अवश्य ही-लहलहा उठी है। इन फसलों केञ् दाने भी पक जाते गर महाराज की इनायत हो जाती, लेकिन उनकी अनुपस्थिति केञ् सूखे ने बेला गांव की राजनीति की फसल को चौपट करने की कगार पर ला खड़ा कर दिया है। हां, फिर भी कुञ्छ लोग शहर केञ् हृदय स्थल महाराज बाड़े पर बैठ न्याय की बाट जोहने लगे। उन्हें कौन समझाये कि खण्डहर केञ् सामने बैठ, अपना सिर पटकने केञ् कोई मायने नहीं हैं? जो लीपापोती होनी है, वह हो रही है और आने वाले दिनों में ही रसूखदारों केञ् परिजन विभिन्न कानूनी धाराओं से मुタत हो जाएंगे। शायद लगता है अब लोकतंत्र का यह तकाजा भी हो चला है। जनाब यह राजनीति है ही उस व्यवस्था का नाम, जिसमें आप कुञ्छ भी करते रहें लेकिन कोई आप पर उंगली उठाने का दुःसाहस नहीं कर सकेञ्गा और जो ऐसा करने की जुर्रत करे तो उसका बाजू समेत हाथ ही उखाड़ लिया जाये। सो यहां भी कानून केञ् लミबे हाथ उन्हीं गर्दनों को नापेंगे? इसमें संशय है। बेला गांव से लेकर ग्वालियर शहर और भोपाल में जो व्यवस्था की गई है उससे तो मैच फिタंिसग केञ् आरोपी भी शरमा जायें? यह तो नहीं पता मैदान केञ् खिलाड़ी राजनीति केञ् खिलाड़ी को अपना गुरु बना फिタसिंग का गुर कब सीखेंगे, ऐसी न तो खबर है और न ही कोई अफवाह उड़ी है? हां.. बेला गांव को लेकर जो अफवाह लीक हुयी हां....हां.... किसी जमाने में खबरें लीक हुआ करती थीं, अब इतनी मैनेज्ड व्यवस्था है कि जो मैनेज्ड होने से रह गया वह अफवाह लीक करने की जुगत में जुट जाता है?अफवाह तो यह है कि महाराज इस मामले को लेकर उतने गंभीर इसलिये नहीं हुये कि कहीं व्यापारियों से भी रूञ्-ब-रूञ् न होना पड़ जाये? लेकिन लोकतंत्र में कानूनी चौसर पर उनको पूरा यकीन होगा तब ही उन्होंने कोई आश्वासन देना उचित नहीं समझा। दूसरी ओर अफवाह यह भी है कि बेला गांव केञ् पीडि़त केञ् परिजनों को न सिर्ड्डञ् शासकीय नौकरी का झुनझुना पकड़ाया गया है बल्कि इतनी व्यタतिगत इमदाद की बात कही जाने की अफवाहें हैं कि मृतक की आने वाली सात पुश्तें भी उतना मजूरी करकेञ् नहीं कमा पातीं। दूसरी ओर सरकारी कागज कारे करने वाले लिखिया मुंशी भी वही भिाि चित्र कागज पर उकेञ्र रहे हैं जो उनसे कहा जा रहा है। अन्यथा स्थानान्तरण की तलवार ऐसी कि टीपू सुल्तान की तलवार को भी पराजित कर दे। खैर....साहब, यह तय हो चला है, मृतक केञ् परिजन उसे ही आरोपी मानेंगे जिसको हम मनवाना चाहते हैं, हां....गड़बड़ी तब हो जाती जब मामले की सीबीआई जांच की अनुशंसा हो जाती? फिर जो सच आता वह मनमाफिक नहीं आता। खैर राहत है कि चलो रणनीति केञ् तहत ही राजनीति केञ् प्राश्रय में ही विभिन्न अपराधों में वांछित खुला घूम रहा आरोपी की गर्दन नाप ली गई है। अब कम से कम उन मामलों में आरोपी पर कुञ्छ कार्यवाही तो अवश्य ही होने की उミमीद की जानी चाहिये जिसमें वह अर्से से कानून की गिरヘत से बाहर था? बेला गांव केञ् बहाने ही सही किसी को न्याय तो मिल ही जायेगा?

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