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Posted by babul on 8/23/2010 12:45:00 PM
महंगाई डायन... खाय... जात... है
- रवि कुमार बाबुल
चलो जनाब, महंगाई को लेकर हम भारतीयों का एक भ्रम तो टूटा कि वह सिर्ड्डञ् गरीबों को ही नोचती-खसोटती है। अब तो साहब सुरसा की तरह देश में बढ़ रही यह महंगाई मुल्क केञ् त्त् फीसदी गरीबों को ही नहीं बल्कि देश केञ् ख् प्रतिशत उन रहीसों और खासकर उसमें भी वह तबका जो रेड कॉरपेट से नीचे उतर कर देश की भूखी आबादी केञ् साथ कदम-ताल नहीं मिला सकता है, केञ् गिरेबान में भी महंगाई ने अपने हाथ डाल दिये हैं タयों कि रहीसों का यह तबका रेड कॉरपेट पर चलने का आदी हो चला है और दिखलाने केञ् लिये ही सही, वह अगर भूखी आबादी केञ् साथ कदम-ताल मिलाने की कोशिश करे तब वह पैरों में उग आने वाले छालों केञ् डर से ऐसी हिमाकत कर सकने की स्थिति में खुद को नहीं पाता है।एक जमाना था, जब महंगाई का नाम सुनकर सरकार बगले-झांकने लगती थी तथा पसीने-पसीने हो जाती थी। यही नहीं वह इससे बचने का रास्ता ढूंढती थी। बीते दिनों की यह बात शायद ही कोई भूला हो जब भरत कुञ्मार हां...हां...अपने मनोज कुञ्मार की सार केञ् दशक में महंगाई को लेकर रोटी, कपड़ा और मकान फिल्म रुपहले पर्दे पर आई और इस फिल्म केञ् गीत ..... बाकी जो बचा सो महंगाई मार गयी केञ् बहाने आम मतदाता महंगाई को लेकर सवाल कर बैठा सरकार से। ऐसे में सरकार केञ् पास महंगाई कम करने का अलादीन का चिराग या अन्य कोई रास्ता तो था नहीं सो वह मतदाता को जवाब タया देती? अंततः केञ्न्द्र में बैठी इंदिरा सरकार केञ् अधीन विभाग ने एक फरमान जारी कर दिया कि ..... बाकी जो बचा महंगाई मार गयी गाना किसी भी (तब निजी रेडियो स्टेशन संचालित नहीं थे) रेडियो स्टेशन पर नहीं बजाया जाये और सरकार केञ् हुタम का अक्षरशः ऐसा पालन हुआ कि यह गाना आज तलक सरकारी रेडियो (आकाशवाणी) पर प्रतिबंधित है। सरकार केञ् बीच ऐसा डर सार केञ् दशक में था महंगाई को लेकर, लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुञ्ल विपरित हैं। आज भी केञ्न्द्र में काबिज सरकार, तब की पार्टी की ही सरकार है और महंगाई केञ् इस दौर में आम जनता केञ् यह नुमाइंदे सरकार में बैठ, इत्मीनान से जुगाली करने में मशगूल हैं। हां, परिवर्तन यह हुआ कि इन चालीस सालों में ब-मुश्किल एक जून की रोटी चबा कर आम जनता महंगाई केञ् जुल्म को ढोना तो सीख ही गयी है। उसकेञ् विरोध केञ् तेवर भी बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की वजह से बिगड़ चुकेञ् मौसम चक्रञ् की तरह बिगड़ गये। भारतीय सैल्युलाइड पर सार केञ् दशक में छाये मनोज कुञ्मार की जगह सन्‌ ख्क् में आमिर उभर आये और देश में दम तोड़ते सिनेमाघरों केञ् बजाय मॉल संस्कृञ्ति में बैठ सिनेमा देखने केञ् शौकीनों केञ् लिये फिल्म पीपली लाइव में गीत लिखने केञ् लिए न तो इस बार कहानी में कोई जरूञ्रत महसूस करवायी गयी और ना ही निर्देशक कहानीकार केञ् साथ मिल बैठ कर गीतकार संगीतकार ने .....बाकी जो बचा महंगाई मार गयी लिखा। फर्कञ् यह रहा कि छाीसगढ़ से मस्सककली (दिल्ली म्) केञ् बाद ही लोक संस्कृञ्ति की मिट्टी की सौंधी सुगंध केञ् साथ फिर जो गीत आया वह भी एक स्कूञ्ली शिक्षक गयाप्रसाद प्रजापति ने संभवतः देश केञ् बेलगाम और निर्भीक हो चले हुタमरानों केञ् विरुद्ध खीज स्वरूञ्प महंगाई को लेकर लिखा। यह गीत सखी सईयां तो बहुत ही कमात हैं, महंगाई डायन.. खाय.. जात...है को लोकधुन पर ही रिकार्ड कर लिया गया, फिल्म पीपली लाइव यह गाना न सिर्फञ् फिल्म केञ् प्रमोशन केञ् लिये निजी चैनलों और रेडियो स्टेशनों पर छा गया बल्कि खबरिया चैनलों केञ् लिये एक-आध घण्टे का चबाने लायक टाइम पास मूंगफली भी साबित हुआ। गीत सखी सईयां तो बहुत ही कमात हैं, महंगाई डायन.. खाय.. जात...है को सुन कर सरकार केञ् कान में जूं नहीं रेंगी है लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार केञ् सरदार विकास केञ् ढोल-तासे बदस्तूर पीट रहे हैं वहीं सरकार में शामिल बयान बहादुर मंत्री पवार तीन में से वह एक मंत्रालय छोडऩे को अडिग दिख रहे हैं, जिसका सीधा वास्ता महंगाई और आम जनता से है, ऐसे में पवार अगर पद छोड़ भी दें तो महंगाई तो बढ़ेगी ही, रुकेञ्गी नहीं। पेट्रोल-डीजल को ओपन मार्केञ्ट में धकेञ्लकर यह उミमीद लगा ली गयी कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ते-घटते कच्चे तेल की कीमतों का फायदा लोगों को मिलेगा लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें भले ही कम हो जायें लेकिन भारतीय बाजार में तेल की कीमतें कम करने का कोई खाका ही सर्वसミमति से तैयार नहीं है, सरकार की तरफ से कミपनी को अभी यह स्पष्ट ही नहीं किया गया है कि सात दिन, क्भ् दिन या प्रतिमाह कीमतें रिवाइज होंगी। बस, ममता बहन केञ् दूरंतो की तर्ज पर महंगाई की चाल दूर जाकर भी नहीं रुकेञ्गी। बढ़ती महंगाई से लोगों का जीना मुहाल हुआ जा रहा है। सホजी वाले अब किलो का नहीं पाव का दाम बताने लगे हैं और महंगाई केञ् इस दौर में जेब भी युवा हो चले लोकतंत्र केञ् विपरीत देश केञ् बच्चों की सी तकदीर पा बैठी कि सीधे बचपन से बुढ़ापे में कदम रख बैठी? हालत तो यह हो चली है कि आप देश बन्द रखें या फिर घर केञ् चौकेञ्-चूल्हे। सरकार ने मुनादी करवा दी है यू-टर्न न लेने की तो सरदार केञ् नेतृत्व में सरकार विकास केञ् लिये लगता है कि अब हमारी लाशों पर से भी गुजरने से गुरेज नहीं करेगी। ऐसे में सन्‌ ख्क् में डायन महंगाई को लेकर लिखे गये गीत से बे-लगाम और निर्भीक सरकार タयूं और किससे डरे, समझा पाना आसान नहीं है।

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