0
Posted by babul on 8/23/2010 12:47:00 PM
सत्ता से बाहर होने की खुजली
- रवि कुमार बाबुल
सुरसा की मानिंद बढ़ रही महंगाई केञ् बीच पिस रहा आम आदमी और इसी आम आदमी केञ् दम पर साा-सुख भोग रही कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार केञ् लापरवाह और बे-परवाह मुखिया। जीडीपी केञ् सुर और ताल पर मनमोहन सिंह केञ् नेतृत्व में थिरकते मंत्रिमण्डल केञ् लय-ताल से बेहाल विपक्षी पार्टियों ने एकजुट हो, सफल विलेन की साझा भूमिका निभाते हुये देशव्यापी बंद का आह्वान किया और यह बंद सफल भी रहा। ऐसा समाचार पत्रों की प्रथम लीड केञ् रूञ्प में छाया हुआ है। हालांकि उम्र केञ् हाशिये पर पहुंच चुकेञ् बाल मन वाले कुञ्छ बुजुर्गों का तो यह कहना है कि आज से ख्म् वर्ष पूर्व भी ऐसा ही बंद का असर देखने को मिला था। उस समय इसकी नुमाइंदगी उस शチस ने की थी, जिसमें आज इतनी ताकत भी नहीं रही कि वह बगैर कोर्ट की दखलंदाजी केञ् यह तय कर सकेञ् कि वह अपनी पत्नी केञ् साथ रहे या फिर अन्य...केञ्, जार्ज फर्नांडीज पर चर्चा फिर कभी। खैर...बात महंगाई ञ्की है, जी हां बढ़ती बेलगाम होती महंगाई की। आज आम व्यタति की हालत यह हो गयी है कि उसकेञ् लिए दो जून की रोटी जुटाने की जुगत भारी पड़ने लगी है और आमजन को बेदम किये जा रही विकास का दम भरने वाली सरकार भी यह जिद किये बैठी है कि वह विकास का पहिया थमने नहीं देगी। शायद यही वजह है कि कुञ्पोषण की पगडंडी को फोर-लेन हाईवे में तホदील कर दिया गया है, पेट्रोल-डीजल केञ् दाम बढ़ा कर। एक लीटर पर तीन-चार रुपये की बढ़ाोरी कर, सरकार ने आवश्यक खाद्य वस्तुओं केञ् दाम इस कदर आसमान पर पहुंचा दिये हैं कि उसका वहां से लौटना उतना ही मुश्किल है जैसे किसी मृत व्यタति को मुタतिधाम ले जाकर मुखाग्नि देने केञ् बाद वापस इस संसार में जीवित करने की कल्पना करना। मनमोहन सिंह जी, यह जरूञ्र याद रखियेगा, महंगाई की कोई जाति और धर्म नहीं होता है, सो वोट केञ् लाभ-हानि के लिये कोई भी पार्टी इसका आंकलन नहीं करेगी तब ऐसे में आपकेञ् सामने विभिन्नता लिये हुये तमाम दल एक साथ आपकेञ् निर्णय की मुखालफत करेंगे, आम जनता केञ् लिये और आम जनता आप से सीधे अनुारित सवाल करेगी वह अलग। बल्कि हकीकत तो यह है कि जाति और उसकी राजनीति करने वाले दल भी भले कितना ही मन-भेद या मतभेद रखते हों लेकिन महंगाई ने उन्हें अपने झंडे-बैनर तले आने पर मजबूर कर ही दिया है कि वह भले ही अपने झंडे बैनर केञ् वजूद लेकर आये, लेकिन आना होगा महंगाई केञ् बैनर तले ही।आज स्थिति यह हो चली है कि खरबपति सरकार केञ् करोड़पति नुमाइंदे यह जतलायें कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की खातिर धन जुटाने केञ् लिए इतनी मामूली महंगाई जरूञ्री है, तो देश की अस्सी प्रतिशत आबादी यही पूछेगी कि नेताओं से अलहदा चिकित्सकों की राय? कि उनकी लिखी दवा तो कुञ्छ खा कर ही खायी जा सकती है, वर्ना बीमारी संग मिलकर दवा बे-जान से हो चले शरीर से नूरा कुञ्श्ती करने से नहीं चूकेञ्गी। सरकार, देश की सड़कों की सूरत बदलने की チवाहिश केञ् चलते सड़कों को हेमामालिनी केञ् गालों की सी शタल देने की लाख कोशिश जारी रखे तब भी देश की मात्र बीस प्रतिशत ही आबादी जो देश की अस्सी फीसदी भूखे-नंगों को रौंद कर अपनी मंजिल तय कर सकती है? शिक्षा केञ् मायने भी अलग हैं, कहा जाता है शिक्षा व्यタति को मनुष्य बनाती है, उसे दूसरों की दुःख-तकलीफ महसूस करने लायक बनाती है, केञ्न्द्र में बैठ साा सुख भोग रहे सरकार केञ् नुमाइंदे किस पाठशाला में ककहरा पढ़ कर पले-बढ़े हैं, यह तो वही जानें, लेकिन मैंने तो एक लोकोタति सुनी व पढ़ रखी है कि भूखे भजन न होय गोपाला। तो जनाब अनिवार्य शिक्षा केञ् बावजूद भूखे पेट कोई कैञ्से पढ़े? और कोई タयों पढ़वाये? यह पढ़ाकूञ् बन सकते हैं लेकिन दो जून की रोटी केञ् लिये नन्हें हाथों में जूठे बर्तन और औजार होना महंगाई केञ् इस युग की मांग ही नहीं बल्कि अनिवार्यता भी है। ऐसे में देश की अस्सी फीसदी आबादी केञ् बच्चे कैञ्से पढ़ें? कैञ्से बढ़ें? हां यह सोलह आने सच है कि सरकार केञ् जारी महंगाई केञ् मंजीरे पर अब जनता कोई भजन नहीं गा सकती है? हां, सरकार ने महंगाई की जमीन पर जिस श्रेणी केञ् वोटर (जनता ) को बोकर भविष्य में साासुख की फसल काटने की तैयारी कर रखी है, वह जनता मॉल और लタजरी वाहनों में आज भले ही तफरीह करे, भविष्य में भी आपकी सरकार बनवाने में मदद का आश्वासन देकर। लेकिन जनाब देश की अस्सी फीसदी जनता भी अगले चुनावी मौसम में गाजर घास बने बगैर नहीं रहेगी? यह भी तय माना जाना चाहिये। फिर आपको साा से बाहर होने की खुजली कितने वर्षों तक खुजलानी पड़े यह अभी कहना जल्दबाजी ही नहीं ज्यादती भी होगी।

|

0 Comments

Post a Comment

Copyright © 2009 babulgwalior All rights reserved. Theme by Laptop Geek. | Bloggerized by FalconHive.