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Posted by babul on 8/23/2010 12:48:00 PM
जिगर, जेहन, जमीर की जमीन पर न्याय की जिद
- रवि कुमार बाबुल
साहब अंततः वही हुआ जिसकी मांग घटना केञ् दिन से ही बेला गांव केञ् पीडि़त और उनकेञ् समर्थक कर रहे थे यानि वह चाहते थे कि इस घटना की निष्पक्ष जांच केञ् लिये यह जरूञ्री है कि शिवराज केञ् कबीने में शामिल और बेला गांव घटना केञ् आरोपी केञ् परिजन अनूप मिश्रा का इस्तीफा स्वास्थ्य मंत्री केञ् पद से ले लिया जाये। यूं तो ग्वालियर में कई हत्याएं हुई हैं और इन हत्याओं केञ् पीछे कोई न कोई वजहें भी रही होंगी लेकिन शहर में राजनीतिक परचूनी की दुकान चलाने वाले राजनीतिज्ञों को इतनी ड्डुर्ञ्सत नहीं थी कि वह बेला गांव की घटना केञ् साथ ही अन्य हत्याओं केञ् मामलों में भी बेला गांव जैसा ही आंदोलनात्मक रुख अチतियार कर लेते। वजह साफ है कि बेला गांव केञ् मामले में भीखम और अन्य पीडि़तों को इंसाफ दिलाना इनका मकसद नहीं था वरन रसूखदार मंत्री केञ् वर्चस्व पर चोट कर, आम जनता में यह अफवाह ड्डैञ्लाना भी था कि वह जनता केञ् हित केञ् लिये किसी से भी पंगा लेने का दुस्साहस जुटा सकते हैं। हालांकि राजनीति केञ् इन सींकिया (मरणासन्न अवस्था वाले) पहलवानों की असल ताकत तो कीचड़ वाले कमल दल केञ् अपने ही लोग थे, जो नहीं चाहते थे कि अनूप का दामन पूर्व विभाग में मंत्री रहने और आर्थिक अपराध अन्वेषण ホयूरो की कार्यवाही केञ् बावजूद पाक-साफ दिखे या फिर रहे। सो....बेला गांव की घटना से उनकी मुराद पूरी होने का रास्ता अチतियार हुआ और वह सफल भी हुये।प्रदेश में विपक्ष अनूप केञ् इस्तीड्डेञ् को अपनी ताकत बता, अपनी जीत मान खुद की पीठ थपथपा रहा है तो वह इस मर्डर हिस्ट्री को लेकर गलतफहमी में है। अगर प्रदेश का विपक्ष इतना ही शタतिशाली होता जो किसी मंत्री को इस्तीड्डेञ् केञ् अंजाम तक पहुंचा सकता है तो शहर में अन्य हत्याओं केञ् मामले में भी कार्यवाही की रヘतार तेज और बदस्तूर जारी रहती पर ऐसा हो न सका, タयोंकि विपक्ष कमजोर था और उसका दबाव बे-असर। ऐसे में अब कमल दल केञ् उन लोगों की तारीफ तो करनी ही पड़ेगी जिन्होंने सशタत विपक्ष की सी भूमिका निभाई और परिणाम सामने है।अनूप मिश्रा भले ही अब शिवराज सिंह केञ् कबीने में मंत्री न हों लेकिन विधायक तो हैं ही और एक विधायक केञ् रसूख को भी राजनीति में कम करकेञ् आंकना बेमानी है। यह तो भला हो बेला गांव घटना की अंगीठी में राजनैतिक रोटी सेंक रहे लोगों का, जिन्होंने अनूप मिश्रा से विधायकी से इस्तीफा नहीं मांगा, वर्ना इस मामले को सुलटाने में और ज्यादा मशタकत करनी पड़ती? बेला गांव की घटना में इंसाफ को लेकर आमजनों में असमंजस सी स्थिति है, नामजद आरोपी को पुलिस अभिरक्षा में न लिया जाना, घटना को अंजाम देने की स्वीकारोタति वाले शチस को आरोपी बना गिरヘतार कर उस पर कार्यवाही करना प्रशासन केञ् लाचार तथा बौने पक्ष को ही साबित करता है, जो यह भी दर्शाता है कि न्याय की बाट जोह रहे लोगों केञ् लिये सारी स्क्रिञ्प्ट तो जिद, जिगर, जेहन और जमीर की जमीन पर ही लिखी गयी है। प्रदेश केञ् रसूखदार मंत्री केञ् परिजनों ने जिस जमीन पर बेला गांव केञ् आम रास्ते को रोक कर, अपराध का जो रास्ता अチतियार किया उससे लोगों का जिगर छलनी-छलनी हो गया और फिर जिगर केञ् करीब रहने वाले परिजनों केञ् चलते ही अनूप मिश्रा की मंत्रीपद की कुर्ञ्सी ही जाती रही, शायद जनता केञ् जेहन में उठ रहे पक्षपात केञ् सवालों केञ् झंझावात का माकूञ्ल जवाब भी यही था और अनूप केञ् जेहन में परिवार को पाक-साफ बनाये व बचाये रखने का रास्ता भी। विपक्षी दल केञ् लोग कुञ्छ भी बोले, タया फर्कञ्, लेकिन उनकेञ् (अनूप केञ्) अपने ही दल केञ् लोगों ने अपने शホदों को अनूप ने मुंह में उड़ेलने की तमाम कोशिशें कीं। कुञ्छ ने तो यह कह दिया कि बेला गांव मामले में इंसाफ केञ् लिये जमीर केञ् चलते मंत्री पद से इस्तीफा दिया। ठीक है जनाब बेला गांव ही नहीं बल्कि अन्य दर्जनों गांवों की बेहतरी केञ् लिये जिस शチस केञ् परिजन मुट्ठी भर जमीन नहीं छोड़ सकेञ् वह बेला गांव पीडि़तों को न्याय मिले इसलिये जमीर केञ् चलते कुर्ञ्सी छोड़ दें? इससे बेहतरीन चुटकुञ्ला आज केञ् परिप्रेक्ष्य में कोई दूसरा हो नहीं सकता है? विभिन्न दलों की चल रही राजनीति केञ् बीच भले ही अनूप मिश्रा विधायक पद पर काबिज रह कर आरोपी बने अपने परिजनों को पाक-साफ करने और बेला गांव केञ् पीडि़तों को न्याय दिलाने का मन रखते हों? लेकिन जनता की जिद भी न्याय लेकर रहने की है। उミमीद की जानी चाहिये कि जिद, जिगर, जेहन और जमीर केञ् चलते जिस जमीन पर न्याय की इबारत लिखी जानी है उसे पढक़र आने वाली पुश्तों को शर्मिन्दगी नहीं होगी। यह तय है कि भीखम केञ् रタत से लिखा नाम किसी रेतीली जमीन पर नहीं बल्कि उर्वरा मिट्टी वाली जमीन पर लिखा है, जो किसी सैलाव केञ् बाद मिटेगा नहीं बल्कि अपने साथ हुये नाइंसाफी केञ् बावजूद इंसाफ की जिद किये मौजूं में मौजूद होगा? शायद मंजर भोपाली ने सच ही कहा है किःहम अपने घर में भी महड्डूञ्ज नहीं रह सकेञ् ।कि हमको नीयत दीवार-ए-दर नहीं मालूम॥

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