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Posted by babul on 8/23/2010 12:37:00 PM
गधे और खच्चरों को चेतक सिद्ध करने का प्रयास
- रवि कुमार बाबुल
अभी हिन्दुत्व केञ् तथाकथित आतंकवादी चेहरे को उजागर करने वाले एक न्यूज चैनल पर हिंसक हमला किये जाने की खबर बासी भी न हो पायी थी कि मालेगांव मामले में प्रज्ञा सिंह सहित सभी आरोपियों को कोर्ट ने मकोका केञ् दायरे में रख, कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। जो सミपूर्ण हिन्दू या हिन्दुत्व का कतई प्रतिनिधित्व नहीं करती है। वह प्रज्ञा सिंह कट्टर हिन्दूवादी तो हो सकती हैं, इसे स्वीकारने में शायद किसी को गुरेज नहीं होगा। यहां बात उस चैनल की है जिसने हिन्दुत्व केञ् तथाकथित आतंकवादी चेहरे पर से नकाब उठाकर खुद की पीठ थपथपाने की पुरजोर कोशिश की है। लोकतंत्र का चौथा स्तミभ कहे और समझे जाने वाले इस चैनल सहित अन्य मीडिया से यह उミमीद तो कतई नहीं की जा सकती है कि वह हर मुसलमान को तो आतंकवादी मानने से गुरेज करता रहे लेकिन मुट्ठी भर ऐसे लोगों की वजह से जिनकी गोवा, मालेगांव, अजमेर आदि सहित अन्य जगहों पर हुये विस्फोटों में संलिप्तता मान, देश की जांच एजेन्सी ने उन बाबाओं, साधुओं और हिन्दूधर्म केञ् कट्टर अनुयायियों को कटघरे में ला खड़ा किया है, केञ् आधार पर सミपूर्ण हिन्दुओं को ही आतंकी मान लिया जाये? आज केञ् परिप्रेक्ष्य में न्याय संगत नहीं कहलायेगा।शायद यही वजह रही है कि निष्पक्षता और निर्भीकता का चोला उतार पक्षपात और निजी हित साधने की मंशा केञ् घुन केञ् चपेट में आ चले लोकतंत्र में हमारे इस चौथे स्तミभ ने टीआरपी केञ् चलते हिन्दुत्व केञ् तथाकथित आतंकवादी चेहरे को कुञ्छ इस तरह बेनकाब किया कि कुञ्छ हिन्दूवादी संगठनों और उसकेञ् मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं ने असマय तरीकेञ् से चैनल केञ् दヘतर में हल्लाबोल कर हमला बोल दिया, विरोध का यह हिंसक चेहरा किस आधार पर मुट्ठी भर आतंकी से कमतर आंका जाना चाहिए? यह यक्ष प्रश्न है? जिसका जवाब हमें ढ़ूंढना ही होगा।वैसे तो हर धर्म केञ् अनुयायियों को यह अधिकार है कि वह उसकेञ् तय नियमों में बंधकर उसका पालन करें और ऐसे में हिन्दू धर्म उससे अलग नहीं हैं, हालांकि हिन्दू दर्शन और धर्म (पुरातनकाल) शांति, अपनत्व, भाई चारे और शस्त्र (हथियार) को एक साथ धारण करने केञ् जीवन केञ् मूल-मंत्र से परिपूर्ण है। शायद तभी तो धर्म की रक्षा केञ् लिए जरूञ्री हो जाने पर हथियार न उठाने वाली मनोवृाि को कायरता माना गया है लेकिन बावजूद इसकेञ् मेरी तरह ही सभी को अपने हिन्दू होने पर गर्व होगा लेकिन यहां सवाल यह है कि मीडिया केञ् दिखलाये गये आधे सत्य को क्षミय किस आधार पर कर दिया जाये? माना कि लोकतंत्र का चौथा स्तミभ और राजनेताओं की जुगलबंदी एक सुर में इस हमले की निन्दा करें लेकिन इन्हें ही यह भी जवाब देना होगा कि आखिर मुट्ठी भर दिमागी दिवालियेपन की कगार पर खड़े हिन्दुओं केञ् कथित गिरोह की, किसी हरकत की वजह से सミपूर्ण हिन्दुत्व केञ् मुखड़े पर कालिख पोतने की कोशिश उस चैनल ने जानबूझ कर या अंजाने में कैञ्से कर दी? या इसकी इजाजत उसको किसने दी? उसको यह अधिकार तो मिला ही नहीं था कि वह आधी हकीकत का प्रदर्शन करे? वैसे भी लोकतंत्र केञ् चौथे स्तミभ को इस बात की इजाजत आज तलक तो नहीं मिली है कि वह पूरा सच नहीं दिखलाये? सिर्ड्डञ् रेटिंग या पाठक वर्ग तैयार करने की खातिर।हमें ही नहीं, मीडिया को भी यह स्वीकारना होगा और भविष्य में इस बात का ध्यान रखना होगा कि विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना या फिर चाहे अन्य कोई हिन्दूवादी संस्था या संगठन हो, सミपूर्ण हिन्दुत्व केञ् वह न तो प्रतिनिधि हैं, न ही उसकेञ् आश्रयदाता? यह हिन्दुत्व केञ् एक भाग (अंश) या हिस्सा तो हो सकते हैं लेकिन इनकी कारगुजारियों को हिन्दुत्व की प्रतिछाया मान लेना सर्वथा गलत होगा। संघ केञ् राष्ट्रीय स्तर केञ् एक जिミमेदार प्रवタता ने चैनल पर हमले को लेकर जो दलील दी है, उसी से यह स्वतः ही तय हो जाता है कि हिन्दुत्व में हिंसा की घुसपैठ किस स्तर से शुरूञ् हो चुकी है?अस्तबल में घोड़ों की बजाय गधे और खच्चरों को रख, उन्हंे चेतक सिद्ध करने का प्रयास जो भी धर्म जब-जब करेगा तब-तब हिन्दुत्व का चेहरा लिये आधा-अधूरा चरमपंथ, इस्लामी नकाब पहने मुस्लिम आतंकवाद या अन्य धर्म केञ् अनुयायियों को अपने धर्म वालों की भीड़ में शामिल करने की कवायद केञ् चलते देश और समाज केञ् अन्दर क्षोभ, गुस्सा और हिंसा सड़कों पर बिलखती-बिखरी दिखलायी देगी? जिसे नタसलवाद, माओवाद, उग्रवाद, चरमपंथ और आतंकवाद चाहे कुञ्छ भी नाम दे दें इसकेञ् सामने तो सदैव लोकतंत्र बेचारगी और बदहवास हालत में खड़ा नजर आ जायेगा।

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