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Posted by babul on 8/23/2010 11:39:00 AM

संघ की जो चाह, वही भाजपा की जरूञ्रत
- रविकुञ्मार बाबुल
लगता है कि आजकल नारद केञ् वंशजों केञ् दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं? शायद तभी तो उनकेञ् नारदीय कर्म केञ् अनुसार नित्य-प्रतिदिन चूक हो रही है तथा जिसकेञ् चलते अन्दर की बात अन्दर ही रह जा रही है। आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी को लेकर भी ऐसा ही कुञ्छ हुआ। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर संतरों केञ् लिये मशहूर शहर नागपुर में आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी केञ् दिग्गज नेताओं ने विचार विमर्श कर माथा-पच्ची नहीं की होती? संतरे सा अपना अस्तित्व लिये भारतीय जनता पार्टी केञ् (संतरे की तरह अंदर से कई फांक और ऊपर से एक दिखने जैसा) राष्ट्रीय अध्यक्ष जो वास्तव में अध्यक्ष कम और आरएसएस केञ् मैनेजर ज्यादा माने जाते हैं, को दो टूक यह राय दी गयी है कि भारतीय जनता पार्र्टी केञ् अन्दर जिन गलियारों से होकर जसवंत सिंह आये हैं, उन्हीं गलियारों से उमा भारती, गोविन्दाचार्य तथा संजय जोशी को भी जसवंत सिंह जैसा ही आदर और सミमान देते हुये पार्टी केञ् भीतर लाया जाये? गडकरी केञ् लिये आरएसएस केञ् इस फरमान का पालन करना कितना कंञ्टक भरा और मुश्किल होगा, यह वह खुद भारतीय जनता पार्र्टी में चौकड़ी केञ् बीच घिरे रहने पर महसूस कर रहे होंगे? ताज्जाुब तो यह है कि आरएसएस भी भारतीय जनता पार्टी केञ् शीर्ष नेतृत्व केञ् अग्रपंタति में शुमार चौकड़ी की कार्यगुजारी से अवगत हो चला है और शायद तभी दौरान-ए-चर्चा गडकरी केञ् बहाने, उनको यह नसीहत देने में नहीं चूका कि जहां सब खुद को बड़ा नेता मानने लगें, स्वयं को ज्ञानी मानकर सभी में बड़ा बनने की होड़ मची हो तो ऐसे में उस कुञ्ल का नाश हो जाता है। शायद संस्कृञ्त में प्रचलित उタत उタति केञ् सन्दर्भ का यह सहारा आरएसएस ने चेताने केञ् लिये लिया था?खैर... जनाब इन सब केञ् बीच आरएसएस タया चाहती है, अब वह साफ हो चला है? उसकेञ् यानि आरएसएस केञ् चाहने भर से कुञ्ल( भारतीय जनता पार्टी ) बचा रहता अगर यह चौकड़ी ऐसा कर लेने की छूट दे देती? और शायद आज लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान तस्वीर कुञ्छ अलहदा होती? इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन आरएसएस केञ् इस नजरिये से शायद ही भारतीय जनता पार्टी केञ् सभी कद्दावर नेता सहमत हों कि लोकसभा चुनाव ख्ऽिं में पार्टी की जो लुटिया डूबी है, उसमें खुद को सेタयुलर दिखलाने की लालकृञ्ष्ण आडवाणी की आकांक्षा केञ् चलते, पाकिस्तान की धरती पर जिन्ना की तारीफ करना भी शामिल है। त्त्भ् वर्ष केञ् उम्रदराज हो चले आरएसएस केञ् अग्रपंタति केञ् सदस्यों का यह सोचकर प्रड्डुञ्ल्लित होना, वタत का तकाजा भी है कि इतने वर्षों में संघ ने न तो अपने विचारों का चोला उतारा या बदला और न ही अपने आचरण शैली में कोई दृष्टव्य बदलाव किया जबकि इन वर्षों में कुर्ञ्सी पर बैठने वाले लोग समय-समय पर बदलते रहे? ऐसे में भारतीय जनता पार्टी से अगर संघ यह पूछ बैठता है कि वह (भारतीय जनता पार्टी) बीच-बीच में अपने विचार और शैली से タयूं भटक जाती है तब इसका जवाब タया रहा होता, यह गडकरी और उनकेञ् सिपहसालार जानते होंगे? लेकिन ख्ऽिं केञ् चुनाव परिणाम को देख हम भी इसका सहज अंदाजा लगा सकते हैं। संघ की यह चिन्ता जायज है कि जिसकेञ् सहारे वह जन-जन में अपने तय लक्ष्य की तस्वीर और तामीर देखना चाहती है, उसकी तामील ही भारतीय जनता पार्टी नहीं करवा सकी है। शायद तभी तो संघ से जुड़े दिग्गज, राजनाथ सिंह केञ् जमाने की बात नितिन गडकरी केञ् दौर में करते हुये यह स्वीकारने से गुरेज नहीं करते है कि भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल ने संगठन केञ् अध्यक्ष का मान नहीं रखा। असम चुनाव केञ् दौरान जब तत्कालीन संगठन अध्यक्ष राजनाथ सिंह को वहां का प्रभारी बनाया गया तो इसका सार्वजनिक विरोध किया गया। यही नहीं झारखण्ड मामले में भी राजनाथ सिंह ने पहल की तो उनकेञ् रिश्तेदारों से जुड़ी खदानों की खबरों को अखबारों की सुर्खियां बनवा दी गयीं। भारतीय जनता पार्टी केञ् नेता भले ही न मानें लेकिन शायद संघ मानता होगा कि झारखण्ड में राजनाथ केञ् रिश्तेदारों केञ् खदान हित की खबरें हों या फिर अन्य कोई खबरें यह सभी प्रायोजित होती हैं और कुञ्छ खास अखबार में ही प्रकाशित करवाई जाती हैं, ताकि इनकी गोपनीयता गायब न होने पाये? इन दिनों संगठन केञ् राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी केञ् खिलाफ भी खबरें प्लॉट करने का काम शुरूञ् हो चला है, जिसको लेकर संघ का भारतीय जनता पार्टी केञ् दिग्गजों से जांच कर कार्यवाही करने का मंतव्य जतलाना जायज ही कहा जायेगा। तब, जब बात भारतीय जनता पार्र्टी केञ् पंख ड्डैञ्लाते हौसलों केञ् बीच सिकुञ्ड़ते दायरे सामने आने की चल निकले। सभी इस उミमीद में हैं कि बिहार की बात नागपुर होकर ही दिल्ली जाये लेकिन पहुंचे तो सही और शायद यही आज का शाश्वत सच है कि संघ जो चाहता है वही भारतीय जनता पार्टी की आज की जरूञ्रत भी है।


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