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Posted by babul on 8/23/2010 12:23:00 PM

रेंगते शहर में चौपायों पर रुतबे की bआत्ती

- रवि कुमार बाबुल
प्रशासनिक अमले ने एक बार फिर तय कर लिया है कि वह खेतों को खत्म करने केञ् अपने रवैये को विश्व केञ् बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन केञ् बीच जारी रख, विकास का संतुलन बनाये रखने का जज्बा कायम रखेंगे? और बढ़ती आबादी केञ् बीच हुंकारें भरती विकास की मंशा केञ् चलते ही नगर पालिक निगम ने अंगड़ाई लेते हुये जहां तक अपने प्रशासनिक अंग ड्डैञ्लाये वहां तक की सीमाओं का सीमांकन कर, मातहतों ने उसे अपने आधिपत्य वाले नタशे में शामिल करने की कोशिशें तेज कर दी हैं, नगर निगम केञ् सीमा क्षेत्र को बढ़ाकर। खैर इसकी तो टेलीविजन पर दिखलाये जाने वाले किसी रोतल सोप ओपेरा की तरह लミबी कहानी है? सच तो यह है कि चना, सरसों और कनक केञ् रूञ्प में सोना उगल रहे खेत को मार कर तानी जा रही अट्टालिकाएं और ड्डैञ्लते शहर की छाती को रौंदते सवारी वाहन भी सवाल पूछ रहे हैं कि दो गज जमीं उसको भी कभी मय्यसर होगी या नहीं? यह अलहदा बात है कि तमाम मास्टरों ने समय-समय पर मास्टर प्लान शहर केञ् लिये तैयार किये और चाहे उनमें से कुञ्छ, आम लोगों की जरूञ्रत केञ् भले ही न हो लेकिन राजनीतिक रसूख केञ् चलते हेड-मास्साब ने बगैर किसी टीका टिप्पणी केञ् अपने मुखियाओं से इसे पास करवा, विा पोषित करने की हामी भी भरवा ही ली। यह अलग बात है कि कुञ्छ योजनाएं तो उनसे जुड़े लोगों का विा पोषण करते-करते अपना दम ही तोड़ गयीं और एक ऐसे ढेर में तホदील हो गयीं कि लोग अब यह कहने से जरा सा भी नहीं हिचकते हैं कि इससे बढि़या तो उनकेञ् नाम पर, उनकेञ् लिये यह योजना बनती ही नहीं तो ठीक था? कुञ्छ योजनाएं आम लोगों को जीभ चिढ़ाने लगी हैं कि न हो तो नाले में साफ पानी बहने और नाव चलने का チवाब हमने इसी शहर में ही टूटते देखा है? आज स्थिति यह है कि बरसात भरे इस मौसम में इन नालों में गंदे पानी की निकासी भी सミभव नहीं है। आम लोगों की योजनाएं आम लोगों को ध्यान में रख कर बनायी ही कहां जाती हैं? वर्ना न्नंञ्ट पुल की जो स्थिति है वह नहीं होती। शहर को प्लान करने वाले प्लानरों का ज्ञान किस स्तर का होगा? यह न्नंञ्ट पुल केञ् दो बार पुनर्निर्माण होने केञ् कारण सहज ही समझा जा सकता है? अन्यथा एक ही पुल पर अनावश्यक रूञ्प से दो बार आम जनता का पैसा पानी की तरह नहीं बहा होता। सच तो यह है कि आज भी अगर झमाझम बारिश हो जाये तो जिस जाम से बचने केञ् लिये इस पुल का अस्तित्व सामने आया है। वह अपने अस्तित्व पर ही पुल केञ् नीचे भरे हुये पानी केञ् बीच खड़ा हो, जाम में खड़े लोगों केञ् सामने व्यवस्था और नीति निर्धारकों केञ् सामने सवाल खड़ा करेगा? जिसका जवाब किसी केञ् पास नहीं है। जाम ...जाम से याद हो आया कि शहर केञ् गली-चौबारे ही नहीं, मुチय मार्ग तक जाम से घिरे रहने लगे हैं। सराफा बाजार हो या फिर दीनदयाल मॉल को स्पर्श कर निकलती महारानी लक्ष्मीबाई सड़क। सब जगह जाम, जाम की वजह भी शहर केञ् आम आदमी नहीं, बल्कि वह होते हैं जो अपने चौपायों केञ् अन्दर बैठकर आते हैं और उसकेञ् ऊपर रुतबे की बाी लगा रख, यह चेतावनी भी दे देते हैं कि कोई गुस्ताखी हमारी शान में होने न पाये? फिर タया जाम लगे, जंग हो किसी कि हिミमत कहां जो कार्यवाही की हिमाकत करे? सो जाम जारी रहता है। हमें आज तलक नगर पालिक निगम और शहर को पालने-पोसने वाले यह नहीं समझा सकेञ् कि कोर्ट केञ् आदेश केञ् बाद ही अतिक्रञ्मण केञ् नाम पर बड़ी-बड़ी इमारतें タयों जमींदोज की जाती हैं? लेकिन निरुार सवाल यह है कि जब यह अतिक्रञ्मण इमारतों की शタल ले रहे होते हैं तब इन अतिक्रञ्मणकारियों की ऐसी किसी इच्छा की भ्रूण हत्या करने की मंशा नगर पालिक निगम タयों नहीं रखता है? जब सミपाि का भी कम नुタसान होगा और निगम केञ् अमले को भी कार्यवाही केञ् लिए कम संसाधन तथा लोगों की जरूञ्रत होगी? समझ से परे है। यही वजह है कि अतिक्रञ्मण हटवाने से लेकर कचरे की सफाई तक केञ् लिए कोर्ट का हस्तक्षेप इन दिनों जरूञ्री सा हो चला है। बगैर कोर्ट कमिश्नर केञ् निगम अपने दायित्वों का निर्वहन タयूं नहीं कर पाता है इसे समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। या फिर यह मान लिया जाये कि निगम केञ् कर्मचारी और अधिकारी इस योग्य हैं ही नहीं कि वह शहर को साफ-सुथरा रख सकेंञ्? और आम जन को नारकीय जीवन जीने से मुタति दिलवा सकेंञ्? नगर पालिक निगम का यह विचित्र व्यवहारिक पक्ष को समझना हो तो आप को ग्वालियर में किराने की थोक मण्डी दाल बाजार भी आना पड़ेगा タयोंकि यहां ही वह दृश्य देखने को मिल सकता है कि जब चलते-चलते बैल की रヘतार मंद पड़ने लगती है तो सामान लदी बैलगाड़ी पर बैठा गाड़ीवान बैल की पूंछ उमेठ देता है, बस फिर タया बैल रヘतार पकड़ लेता है? लगता है कि यही नियति स्थानीय प्रशासनिक बैलों की हो चली है और उन पर अक्षरशः लागू होती है कि जब अदालतें उनकेञ् र्काव्यों की पूंछ उमेठती हैं तो वह हरकत में आ जाते हैं, उनकी रヘतार गतिशील हो जाती है। यह तय है कि शहर रूञ्पी बैलगाड़ी में बैल की भूमिका में स्थानीय प्रशासन, मंजिल पाने की लालसा लिये उस पर लादे गये आमजन। भ्रष्टाचार की सडक़ों पर रेंगते पहिये, अपनत्व और सहानुभूति केञ् ग्रीस से मरहूम धुरी से जिन्दाबाद-मुर्दाबाद की आती कर्कञ्श आवाजों केञ् बावजूद हमारा सफर जारी रहेगा जब तक कोर्ट कमिश्नर गाड़ीवान बन प्रशासन की र्काव्य रूञ्पी पूंछ उमेठते रहेंगे यानि टेल-ट्विस्ंिटग करते रहेंगे।


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