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चीन से सिर्फ चटाई ही मंगवाई थी या फिर .....

Posted by babul on 6/21/2015 01:10:00 PM
सुना है आज सब कह रहे हैं योगा करके देश गौरान्वित हुआ है .... जिसे हमारे दादा जी परदादा जी करते आ रहे थे .... वह भी तब जब एकाउन्ट के नाम पर घर की भण्डरी में अनाज रखे होते थे .... आंगन में कुछ दुधारू पशु और खेत में कुछ फलदार वृक्ष....। तब न तो एकाउन्ट  में विदेश से आये 11या 21 करोड़ रूपये होते थे न ही एसईजेड के नाम पर खेतों पर सालों साल तक लटकी किसी योजना के शुभारम्भ के जंग लगे वोर्ड वजूका की तरह टंगे होते थे ....। आम के पेड़ के नीचे पढ़ने के लिए एडमीशन बाबत न तो किसी फरारी से मिन्नतें करनी होती थी .... और योग के लिए मेक इन इण्डिया को चीन से आयातित चटाई की जरूरत ही नहीं पड़ती थी .... धरा पर पड़े कंकड़-पत्थर एक्यूप्रेशर का दायित्व निभा जाते थे सो अलग.... और हां ....कुछ आसनों की कमी आम के पेड़ पर चढ़ने उतरने में पूरी हो जाती थी....।
पश्चिमी देशों की तरह हमें योगा की नहीं खेत, दुधारू पशु, अनाज और आम के पेड़ की जरूरत है ... जिसे ही हम योगा के आसन पर बर्बाद करने से नहीं चूके.... योगा का योग हमारी जीत के जूनून की पराकाष्ठा बने इसलिए हमने इसे कोल्डड्रिक और मिनरल वॉटर पीकर इसे किया..... पेड़ों की हत्या कर बनी लुगदी से बने कागज पर हमने योगा के रूह को लिखने का प्रयास किया, दो जून की रोटी जुटाने की जुगाड़ में भोर से सांझ तक योगा करती अवाम जब थक कर पत्थर को तकिया बनाकर फुटपाथ पर सोने के बाद जागेगी और चटाई देखेगी तब वह भी समझेगी कि यह सब जोड़ (योग) का नतीजा है बाकी के बाद तो हम जैसे लोग ही मुल्क में बच रह जाते हैं ..... पत्थर को तकिया बनाए रखने के लिए।
लोग चीन से चटाई का मामला उठा रहे हैं .... पर किसी ने भी नहीं पूछा किसी से कि भाई
चीन से सिर्फ चटाई ही मंगवाई थी या फिर सलवीर सूट भी जिसकी जरूरत कभी-कभी योगा करते हुए पहनने की जरूरत पड ही जाती है ...... अगर आपको कोई इंर्पोटर बतलाये तो बताईयेगा जरूर.....।
एक मजदूर से जब पूछा योगा नहीं किया .... कहने लगा देश को योगा की नहीं रोटी की जरूरत है मेरे पेट की तरह ..... योगा का दम्भ भरने वाले योगी को योग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी अगर वह एसी का मोह त्याग दें .... वजन कम करने से लिए एसी में बैठकर गर्मपानी में नींबू शहद में डालकर पीने जरूरत ही नहीं पड़ेगी .... और दिल भी दि्क्कत पैदा नहीं करेगा । आज के दिन भी पता नहीं यह  किस पार्टी की साजिश है...



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Posted by babul on 11/25/2014 02:06:00 PM
45वें भारत का अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की शुरूआत
मुख्य अतिथि अमिताभ बच्चन ने किया दीप प्रज्जवलित
- रविकुमार बाबुल

गुजरे जमाने की यादें ताजा करने वाली रोमांचकारी प्रस्‍तुतियों के बीच 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की रंगारंग शुरूआत समारोह के मुख्य अतिथि और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी स्‍टेडियम, बम्‍बोलिम में दीप प्रज्जवलित कर किया ।
इस अवसर पर अमिताभ बच्चन का साथ देते हुए गोवा की राज्‍यपाल श्रीमती मृदुला सिन्‍हा, केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरूण जेटली, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, गोवा के मुख्‍यमंत्री लक्ष्‍मीकांत पार्सेकर, सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौर, प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव बिमल जुल्‍का ने भी दीप प्रज्‍ज्‍वलित किया। मंच पर अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी के अध्‍यक्ष सलाओमिरइदजियाक, झांग जियानया, नाडिया द्रेष्टि, मैरी ब्रेनर और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास ने भी उपस्थिति दर्ज की। मंच का संचालन अभिनेता अनुपम खेर और अभिनेत्री रवीना टंडन ने किया।

अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन ने अपने संबोधन में विभिन्‍न कालखंडों में छा जाने वाली थीम पर बनी उत्‍कृष्‍ट फिल्‍मों का जिक्र करते हुए भारतीय सिनेमा के आकर्षक विकास पर रोशनी डाली। श्री बच्‍चन ने भारत की विविधिता एवं अनेकता के संदर्भ में भारतीय सिनेमा की भूमिका एवं प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया। इस अवसर पर समारोह के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन और केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने भारतीय सिनेमा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत को भारतीय फिल्‍म व्यक्तित्व के लिए शताब्‍दी सम्मान प्रदान किया। सम्मान ग्रहण करते हुए उन्‍होंने इसे अपने निर्माताओं, निर्देशकों, सह अभिनेताओं, टेक्‍नीशियनों और प्रशंसकों को समर्पित किया। इस अदभुत और प्रसिद्ध अभिनेता ने रूपहले पर्दे पर सिनेमा दर्शकों को हर प्रकार से लुभाया है। अपने स्‍वयं के प्रदर्शन को पर्दे पर देखकर वे भावुक हो उठे। इस अवसर पर उन्हें दस लाख रुपये, प्रमाणपत्र और रजत मयूर पदक प्रदान किया गया। भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पिछले साल से यह सम्मान आरम्भ किया गया था।
उदघाटन समारोह के दौरान महोत्‍सव की अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी का भी परिचय सिने प्रेमियों से कराया गया। जिनमें चेयरमैन श्री सलाओमिरइदजियाक (पोलैंड के जाने-माने फिल्‍म निर्माता), श्री झांग जियानया (चीन के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्देशक), नाडिया द्रेष्टि (स्विट्जरलैंड के मशहूर फिल्‍म निर्माता व अंतर्राष्‍ट्रीय लोकार्नो फिल्‍म महोत्‍सव के प्रमुख), मैरी ब्रेनर (जाने-माने अमेरिकी फिल्‍म आलोचक) और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास शामिल थीं।
श्वेत-श्याम सिनेमा युग की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और नृत्‍यांगना पद्मिनी की भतीजी शोभना पिल्‍लई की अपने समूह के साथ आकर्षक प्रस्‍तुतियों ने दर्शकों के स्‍मृति पटल पर भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध नृत्‍य प्रस्‍तुतियों की यादें ताजा कर दीं, खासकर  ‘होठों पे ऐसी बात में दबा के चली आई’ और ‘पिया तो से नैना लागे रे’ जैसे नृत्‍यों ने फिजा में स्‍वप्‍निल जादू बिखेरते हुए उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। इस अवसर पर उपस्थित अन्‍य जानी-मानी हस्तियों में सतीश कौशिक, मनोज बाजपेयी और रूपा गांगुली भी शामिल हुये।
उदघाटन समारोह के दौरान स्‍वच्‍छ भारत को प्रोत्‍साहन देने वाली फिल्‍म के अलावा महोत्‍सव की सिग्‍नेचर फिल्‍म भी दिखाई गई। सिग्‍नेचर फिल्‍म का निर्देशन शाजी एन. करुण ने किया है जो भारत के एक जाने-माने फिल्‍म निर्माता हैं। ईरान के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्माता मोहसेन मखमलबफ द्वारा निर्देशित की गई ‘द प्रेसिडेंट’ महोत्‍सव की शुरुआती फिल्‍म थी।
गोवा में आयोजित 11 दिवसीय 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के दौरान 79 देशों की 178 फिल्‍में दिखाई जायेंगी। इन फिल्‍मों को विभिन्‍न श्रेणियों में बांटा गया है। विश्‍व सिनेमा (61 फिल्‍में), मास्‍टर-स्‍ट्रोक्‍स ( 11 फिल्‍में), महोत्‍सव बहुरूपदर्शक (फेस्टिवल केलिडोस्‍कोप) (20 फिल्में), सोल ऑफ एशिया (07 फिल्‍में), डाक्‍यूमेंट्री (06 फिल्‍में), एनीमेटेड फिल्‍में (06 फिल्‍में) इन श्रेणियों में शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय पैनोरमा वर्ग में 26 फीचर और 15 गैर फीचर फिल्‍में होंगी। पूर्वोत्‍तर महोत्‍सव का फोकस क्षेत्र है, इसलिए आईएफएफआई 2014 में भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की 07 फिल्‍में प्रदर्शित की जाएंगी। क्षेत्रीय सिनेमा भी महोत्‍सव का महत्‍वपूर्ण अंग होगा। इस वर्ष के समारोह में गुलजार और जानू बरूआ पर पुनरावलोकन वर्ग (रिट्रोस्‍पेक्टिव सेक्‍शंस), रिचर्ड एटनबरो, रॉबिन विलियम्‍स, ज़ोहरा सहगल, सुचित्रा सेन पर विशेष समर्पित फिल्‍में और फारूख शेख को विशेष श्रद्धाजंलि अन्‍य आकर्षण होंगे। नृत्‍य पर केंद्रित फिल्‍मों का एक विशेष वर्ग होगा तथा व्‍यक्तित्‍व आधारित पुनरावलोकन (रिट्रोस्‍पेक्टिव) और मास्‍टर क्‍लासेज/कार्यशालाएं भी आईएफएफआई 2014 का हिस्‍सा होंगे।
आम सिनेप्रेमियों के लिए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर मुफ्त में भारतीय फिल्‍मों की ओपन एयर स्‍क्रीनिंग इस महोत्‍सव का नया आकर्षण है। फिल्‍मों के प्रथम विश्‍व प्रदर्शन के अलावा आईएफएफआई 2014 के दौरान प्रतिनिधियों के लिए फिल्‍म बाजार, 3डी फिल्‍में, भोज, मास्‍टर क्‍लासेज, पैनल परिचर्चा व स्‍टॉल्‍स और ओपन एयर स्‍क्रीनिंग जैसी रंगपटल की गतिविधियां संचालित हुईं ।

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Posted by babul on 4/30/2013 08:40:00 PM





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मुझको न भूलाना तुम

Posted by babul on 4/11/2013 01:22:00 PM


तन्हाईयों से कहो चुप रहे, चीखना-चिल्लाना जरूरी था।
दिल को कौन दिलाए यकीन, उसका जाना जरूरी था।

अपने जागने का सबब यह कहकर छिपाया सबसे मैंने,
चांद सो न जाये, इसलिये मेरा जागना जरूरी था।

यह शर्त कहां थी मेरी, मुझको न भूलाना तुम,
हां, यह तय था, तेरा याद रहना जरूरी था।

तुमको बेवफा न कह दें मेरे जानने वाले कहीं,
इश्क में हादसा कोई, दोस्तों को सुनाना जरूरी था।

वक्त की जमीं पर बिखेर दिये खत के पुर्जे,
तू मेरा था कभी, यह सबसे छिपाना जरूरी था।

  • रविकुमार बाबुल



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दर्द

Posted by babul on 8/22/2012 09:24:00 AM

आओ कात लें धागा हम तुम।
सिल दें हम अपने रिश्ते को।
जख्मों का इल्जाम न हो तेरे सर,
और जग-जाहिर न हो दर्द मेरा।

  • रविकुमार बाबुल


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मेरे आंगन में

Posted by babul on 8/22/2012 09:23:00 AM

देखो सूरज डूब रहा है।
अब तो तुम लौट आओ।
चांद के रहने तक रह लेना,
तुम साथ मेरे आंगन में।

  • रविकुमार बाबुल


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तेरा चाहा

Posted by babul on 8/22/2012 09:19:00 AM

खुदा से तुम्हें,
मांगा था मैंने।
वह दे न सका,
तुम्हें मुझको।
तन्हा रहूं,
यह चाहा था तुमने,
कर दिया तेरा चाहा,
तू अब मेरे पास नहीं।

  • रविकुमार बाबुल



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अनगिनत सवालों के घेरे में...

Posted by babul on 8/16/2012 08:11:00 PM

हम आजाद तो हुए, लेकिन लोकतन्त्र का वास्तविक अर्थ क्या है यह आज तक नहीं जान पाये। मनमानी और निजी स्वतंत्रता हमारी स्वतंत्रता की परिधि में आयी, उच्छृंलता और अधिकार के चलते राष्ट्रीय भावना का लोप होता चला गया। हमने सदैव अधिकारों की बात तो जोर-शोर से की परन्तु अपने कर्तव्यों की गरिमा को ही हम भूल गये। आज पूरा मुल्क हिंसा, गरीबी और भ्रष्टाचार की जद में आ चला है। यही हिंसा, गरीबी और भ्रष्टाचार हमारी स्वतंत्रता की पराकाष्ठा है। घोर राजनीतिकरण का दुष्प्रभाव यह हुआ कि मुल्क भाषा, साम्प्रदाय और क्षेत्रवाद में बंट गया। आजादी के बाद हमारे स्वप्नदृष्टाओं ने साम्प्रदायिक सद्भाव, ऊंच-नीच की समाप्ति तथा भेदभाव मिटाने के जो स्वप्न देखे थे, वह घटने के बजाय बढ़ते चले गये तथा नेतृत्व का झण्डा उठाये छोटे-छोटे क्षुद्र स्वार्थों से पीड़ित लोगों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हो गये। सत्तालोलुपों ने न सिर्फ हमारे दीन-ईमान तथा सत्यत्व को नेस्तनाबूद किया  बल्कि मुल्क को एक ऐसे दो राहे पर लाकर खड़ाकर दिया जहां आम लोगों का जीवन बदरंग हो चला और सत्ताधीशों और उनके चाटुकारों ने अपने जीवन में भ्रष्टाचार, अपराध एवं दबंगई के दम पर तमाम रंगीनियां हासिल कर लीं। और फिर एक ऐसा संक्रमण-काल आया कि मारा-मारी एवं आपाधापी के दौर में हमारे अपने फर्ज की भूमिका विस्मृृत हो चली। मुल्क से अंग्रेज तो चले गये परन्तु अधकचरे संस्कारों की एक ऐसी संस्कृति छोड़ गये, जिसके प्रभाव से भारतीय मूल की शाश्वत संस्कृति छिन्न-भिन्न हो गयी। नयी पीढ़ी में एक ऐसा भावनात्मक विघटन हुआ कि जीवन-मूल्यों का बदलाव पलक झपकते ही हो गया। वैयाक्तिक स्वतंत्रता तथा भौतिक सुख-सुविधाओं की चकाचौंध में अर्थ की प्रधानता बढ़ती चली गयी। यही से शुरू हुआ आजादी का अवमूल्यन। हर कोई चाहने लगा कि वह स्वतंत्र है, उसके कार्यों में कोई दखल न दे। यहां तक कि सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से वह विमुख हो गया। चिन्ता रही तो सिर्फ इतनी कि उसे जो कुछ मिल रहा है, वह कम है तथा इसकी बढ़ोतरी होनी चाहिए अन्यथा वह विकास की दौड़ में पीछे रह जाएगा एवं उसकी निजी स्वाधीनता घट जायेगी। वैचारिक प्रतिबद्धता आइने में यदि इस आजादी का आकलन हो तो लगेगा कि हालात और भी विकट बन गये। भारतीय संस्कारों की रोशनी लुप्तप्राय:  हो गयी तथा पश्चिम का अन्धानुकरण बढ़ता ही चला गया। यह वह दौर था जब आजादी के तुरन्त बाद भारतीयता का सूत्रपात होना था तथा अधकचरे विचारों का विकल्प परिपक्वता की वैचारिकता की पृष्ठभूमि से भरा जाना था। परन्तु शून्यता से जड़ता को जन्म दिया और एक ऐसी आंधी आयी कि सभी सांस्कृतिक एवं सामाजिक शाश्वत मूल्यों को समेट ले गयी। हम उस मोड़पर आ गये जहां से लौटना असम्भव था और सिवाय उसी रास्ते पर आगे बढ़ने के हमारे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था। स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाते रहे और हम और अधिक गैरजिम्मेदार तथा एकाधिकारवादी बनते चले गये। हमारे भीतर पनपे हठ ने व्यावहारिक जीवन को चालबाज बना दिया और स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी स्वायत्तता ने ले लिया, जिसमें हस्तक्षेप जरा भी पसन्द नहीं था। परिवारों में विघटन हुआ तथा एक छोटी इकाई के रूप में केन्द्रित होने लगी यह व्यवस्था। यह मेरा, वह मेरा, सब मेरा के सिद्धांत से जकड़े हुए जनमानस ने यथार्थ का कठोर धरातल देखना जरा भी नहीं चाहा, इसी का प्रतिफल था कि लोकतंत्र के नाम पर विकृतियां पनपने लगीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था मजाक बनकर रह गयी तथा जनप्रतिनिधि होने का दम्भ भरने वाले ए. राजा, कलमाड़ी, लालू, कनिमोझी और येदुरप्पा माल उड़ाने लगे। जन के सामने केवल बेचारगी शेष रह गयी। एक ऐसा शून्य का घेरा हमारे इर्द-गिर्द बनने लगा कि वैचारिक विपन्नता ने मानव समाज को खोखला बना दिया। सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं परन्तु राजनीति की धुरी एक ही रही।
जानते-बूझते भी हमने जीवन-दर्शन में कर्तव्यों की ओर ध्यान नहीं दिया और उसी का फल था कि आज मुल्क कई तरफ से विघटन के लिए तैयार किया जा रहा है। स्वतंत्रता की इस सालगिरह की सार्थकता तो इस माइने में हो सकती है कि राष्ट्रीयता तथा सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति हर नागरिक सजग रहे तथा अधिकारों की गर्मी से कर्तव्यों की शीतलता को बनाये रखे तो इससे एक सदाबहार खुशनुमा माहौल तैयार हो सकता है। सवाल है तो सिर्फ इतना कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग रोका जाय तथा जो मूल्यहीनता पनप रही है, उसे राष्ट्रभक्ति के जल से सींचा जाये। फिर कोई कारण नहीं कि गणतंत्र की सार्थकता कई अर्थों में राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध न हो।

  • रविकुमारबाबुल



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सावन

Posted by babul on 7/10/2012 08:37:00 PM

हिना लगे हाथों से,
मेरी उम्मीदों सी बरसती,
कुछ बूंदों को।
तुमने जब,
हथेली में रख कर,
उछाला था मेरी तरफ।
तब लगा था,
कोई बता दे,
 सावन इसे ही कहते है?
जब कोई हिना का रंग,
बरसती बूंदों में घोल कर,
मुझको सराबोर कर रहा था?
  • रविकुमारबाबुल

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Posted by babul on 7/06/2012 10:37:00 PM


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हथेली अपनी बिछा दूंगा.....

Posted by babul on 6/10/2012 12:37:00 PM

यूं छुड़ाकर हाथ अपना तुम मुझसे,
लौट चले हो तो लौट जाओ, लेकिन।


थक जाओ कभी मुझको याद कर लेना,
तेरे कदमों में हथेली अपनी बिछा दूंगा।
  • - रविकुमार बाबुल

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प्रेम तेरा पहचाना ही नहीं

Posted by babul on 6/10/2012 12:36:00 PM
ऐ मेरे दिल तू अफसोस न जता,
आंखों की नमी तू भी ठहर जा।

उसने प्रेम तेरा पहचाना ही नहीं,
ऐ आंसू न उसके दरीचे पर जा।
  • - रविकुमार बाबुल

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अपनी रूह और आत्मा की वसीयत भी

Posted by babul on 6/06/2012 02:28:00 PM


जी... न जाने क्यूं लगा कि मैं इश्क के जिस दरवाजे पर खड़ा होकर, जिन्दगी की तमाम मुश्किलों और हालातों से परे, दो पल सुकूंन का गुजारना चाहता था.... कि वह उस दरवाजे को खोल देगा..... अन्दर आने की इजाजत देकर? यूं भी मैंने पहले कभी उसके दरवाजे पर जाने की ख्वाहिश रखी ही नहीं थी..., लेकिन उसका नेह-आमंत्रण बीते वर्षों में रिस-रिस कर मेरी रूह में शामिल हो चला है। यह रूह ही मुझे उसके दरीचे पर जाने की जिद् दिलाए बैठी रही....? अब, जब उसके दरीचे पर जाकर मैंने दरवाजा खटखटाया तभी किसी ने कहा कि जनाब दरवाजा क्यूं खटखटा रहे हैं.... ताला लगा है...। यह आवाज दरवाजे के अन्दर से आयी थी या फिर किसी ने बाहर से ही मुझे लगायी थी..... समझ से परे है....लेकिन दरवाजा बंद था? बहरहाल .... आज बैरंग लौटा हूं.... जो कुछ उसके लिए लेकर गया था, वह सब कुछ उसके दरवाजे पर ही रख-छोड़ आया हूं.... इस उम्मीद में कि  शायद कभी उसके काम आये ....., दुआ.... नेह.... उम्मीद.... विश्वास.... आस्था.... और कर्म....। जी मेरे द्वारा उसके लिए बांधी गयी यह पोटली न तो किसी और के लिए थी... और न ही किसी और के काम आ सकती है....कि जिसे कोई  चुरा ले? लेकिन सोचता हूं मेरी तरह कहीं उसने इसे भी स्वीकारा नहीं तब....? यकीन से कुछ नहीं कह सकता हूं...., संशय है।
जी... कभी-कभी मौसम एक ही वक्त में दो तरह का बर्ताव कर रहा होता है, आज का मौसम मेरे अनुकूल नहीं रहा ... हवाएं बेरहम हो चली हैं..... भरते हुए जख्म को कुरेद देने का माद्दा रखने वाली.....? अब किस या किन आंखों से उम्मीद करूं कि उनकी नमी मल्हम बन जाएगी...?
हम सब जानते हैं कि तपन के बाद मौसम का परिवर्तन शीतलता देता है.... बनकर सावन ...। लेकिन किससे पूंछें कि रेगिस्तान सदैव प्यासा क्यूं रहता है...., दूसरों की प्यास बुझाने का सबब बन कर भी....? कभी महसूसियेगा.. प्यास का स्त्रोत रेत....। यही रेत अपनी अंजुरी में उदास हवाएं लेकर इधर-उधर, गिरती-फिसलती रहती हैं... और प्यास की नदी का प्रस्फुटन भी यहीं से होता है, प्यास के बादल भी यहीं से उमड़ते-घुमड़ते उठते हैं.... दूसरों की प्यास बुझाने की खातिर बरसने के लिए...।
जी... जब यह प्यास नमक बन चले वक्त के बदलते दौर में... तब आत्मा और जिस्म ही नहीं बहुत कुछ की प्यास यह जगाता चलता है। ऐसे में आंखों से फिसल उठ लुढ़कता भी है.... आंसू की शक्ल में रूह बन कर .... । जी... इस प्यास को मुझ जैसे रेत में रहने वाले लोग  यकीनन् भलि-भांति जानते हैं.....।
आज वह  इक पूरा रेगिस्तान मुझको सौंप गया....। एक अनबुझी प्यास जगा गया....। उम्मीद है आने वाला वक्त रेत की मानिंद इस प्यास को चरम तक भड़काकर मुझे शांत कर देगा.... सदा-सदा के लिए.....सो शायद उसे भी सुकूंन मिल जाए हमेशा-हमेशा के लिए। जिसे मैंने टूट कर चाहा ... प्रेम किया.... विश्वास किया....... जिस्म ही नहीं अपनी रूह और आत्मा की वसीयत भी लिख दी जिसके नाम.... उससे या उसको अब क्या कहूं....? जब उसकी हर तकलीफ मेरी है.... तो फिर उसके सदैव खुश रहने और रखने की उम्मीद तथा कोशिश ही कर सकता हूं....। वह जहां भी रहे ईश्वर उसे दुनिया सबसे ज्यादा खुश रखे..... यही मेरे आंसुओं का मर्म भी है और मेरे रूह की दुआ भी....  इस प्यास से बस इक दीपक जलता रहे सदा-सदा के लिए.....?

  •  रवि कुमार बाबुल



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जलूं मैं जिस मोम में

Posted by babul on 6/04/2012 02:33:00 PM
मन में बसा वो, बसा है जिस्म के रोम-रोम में।
इक धागा सा मैं, तुझसा हो कोई इस मोम में।

मेरी बातों से पिघला नहीं क्यूं आज तलक वह,
वक्त की आग में पिघले तू, जलूं मैं जिस मोम में।
  •  रविकुमार बाबुल


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किरचों की तरह हटाया तुमने

Posted by babul on 4/30/2012 12:56:00 AM

क्यूं रिश्ता अपना मुझसे रेत सा बनाया तुमने।
और तमाम वायदों को कांच सा बनाया तुमने।

साथ रहना नहीं था तो टूट ही जाना था इसको,
फिर क्यूं ऐसे ख्वाबों का महल सजाया तुमने।
वक्त   का  क्या,   बावफा  कब रहा है किसी का,
और वक्त  की तरह मुझको  आजमाया  तुमने।

तन्हाई के खराब मौसम में रिश्तों को सम्हाला मैंने,
दुपट्टे के कोरों से किरचों की तरह हटाया तुमने।


मेरे साथ ताउम्र रहने  की बात तुमने ही कही थी,
जोड़ना कभी, कितनी कस्मों को निभाया तुमने।

  • रविकुमार बाबुल



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तुम्हारी यादें बूंद बनके मन को भिगों दे

Posted by babul on 4/30/2012 12:19:00 AM


हर मौसम का एक महत्व है। मौसम बाहर ही नहीं हर किसी के जीवन में आता भी है और छा भी जाता है। मौसम ही इन्द्रधनुष रचता है, यही इन्द्रधनुष ख्वाबों को सींचता भी है। लेकिन शाश्वत सच यह है कि किसी के सभी ख्वाब पूरे कहां होते हैं? मेरे जीवन का ख्वाब भी उसको करीब पाना चाहता था। लेकिन जीवन के मौसम में बसंत के बाद पतझड़ नहीं आएगा। यह सोचने की जुर्रत या साहस मैं जुटा ही नहीं पाया था। या यूं कहें कि इसकी उम्मीद ही नहीं थी? लेकिन उसने मेरे हिस्से में बसंत भी लिखा और पतझड़ भी। टुकड़े-टुकड़े होकर बहुत कुछ बिखर  जाता है , ख्वाब ही नहीं उम्मीद भी?  ऐसे में खुद  के बजूद को बिखरते हुए देखने का दुस्साहस जुटाने में भला  कोई खुद  को कैसे इंकार कर सकता है? बड़ी टूटन होती है, जिस्म ही नहीं दिल भी जब यह मान  बैठे कि सावन की उम्मीद बीजों को करना चाहिेए, बजूका को नहीं? तब ऐसे में बहुत कुछ प्रस्फुटित भी होता है, और कुम्हलाता भी है। उसकी नजर में, मैं बजूका था। और खुद की नजर में  मैं खुद को सदैव बीज ही मानता रहा। समझ नहीं आता, उससे मुुझे किसी तरह की उम्मीद रखनी भी चाहिए थी कि नहीं? 
खैर बसंत के बाद पतझड़ का आना, सावन आने की उम्मीद तो  जगाए ही रखता है। सो.... कोशिश करूंगा कि ख्वाब और उम्मीद के जिस शाख पर मैं था, और मैंने उससे जुड़ कर जिस सावन की एक उम्मीद जगा ली थी, लेकिन मुुझे पता ही नहीं था कि वह तो बसंत थी। जाते-जाते मुुझे सिर्फ पतझड़ ही सौंप कर जा सकती थी? तब वह गलत कहां थी ? सो... कोशिश करूंगा वक्त के उस शाख से भले ही उसके मिलने की नाउम्मीदी में टूटकर, गिर कर बिखर जाऊं ? लेकिन यादों की कोई हवा मुुझे उन शाखों से कभी दूर न ले जाए, जहां उसकी यादें रची- बसी हैं। सोचता  हूं जब कभी किसी सावन की दस्तक हो और तुम्हारी यादें बूंद बन कर मेरे मन को भिगों दे, तब एक दुआ धरती के भींगने की ही नहीं , बल्कि बीजों के प्रस्फुटन के लिए भी करनी होगी? ताकि मेरे प्रति तुम्हारे दिल के बंजर होने का अहसास भुलाया जा सके और इन्हीं अहसासों के आसरे अपने प्रेम को तुम्हारे पास न सिर्फ बोया जाए, बल्कि उसे पोषित और पल्लवित भी किया जा सके? ताकि तुम्हारे बसंत होने के बावजूद सावन की उम्मीद कायम रखी जा सके?

  •  रविकुमार बाबुल



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यकीन

Posted by babul on 3/28/2012 01:47:00 PM

वह तो मैं था,
जो तेरी बातों पर,
करता रहा यकीन।
लोग तो जमाने में,
सच बातें भी,
कहां मानते हैं।



  • रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल

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रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम

Posted by babul on 3/26/2012 11:59:00 AM

दोपहर में बुझा-बुझा सा है सूरज आज।
देखा जब, टूटा दीपक का ख्वाब आज।

कल अंधियारा सौंपा था उसने मुझको,
और पराया हुआ अपना ही साया आज।

रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम,
मैंनें इक चिंगारी सुलगाई  है आज।

कुछ दूरी थी अन्तर्मन की, करीब मैं आया,
मंजिल भूला, राह भटका मैं फिर आज।

सौंधी मिट्टी, महकते फूल, चहकते पंछी,
इनमें बस तू ही तू मुझको दिखता है आज।

  •  रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल


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प्यार

Posted by babul on 3/15/2012 05:53:00 PM

तुम कहते हो,
तुम्हें मुझसे प्यार नहीं रहा।
तब इक बार,
क्यूं नहीं कह देते हो,
तुम, मुझसे,
‘मुझे तुमसे नफरत है’।
मैंनें तुम्हारे प्यार पर,
किया है विश्वास।
तुम्हारे नफरत पर भी,
 यकीन कर लूंगा।

  •  रविकुमार बाबुल

चित्र : साभार गूगल

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रंगोत्सव की शुभकामनाएं

Posted by babul on 3/07/2012 05:32:00 PM

इन्द्रधनुषी रंगों से,
सराबोर कर दूं आपको,
कामना यही है मेरी।

जिस्म ही नहीं,
आपके दिल में उतर जाए रंग,
जीत का जश्न आपको पाकर मनाऊं।
गम नहीं गर हार भी जाऊं,
रंग की तरह बस,
आपका ही होकर रह जाऊं।

रंगोत्सव पर यही है,
शुभकामनाएं मेरी।

  • - रविकुमार बाबुल


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चाहता हूं मैं

Posted by babul on 2/25/2012 04:33:00 PM

आओ समेट लें हम,
अपने-अपने हिस्से की यादें,
तुम मेरी यादों को छोड़ देना,
कहीं-किसी बीच राह में।
मैं तुम्हारी यादों को,
रखूंगा सहेजकर सदा अपने पास।
क्यूंकि हम दोनों की यादों ने,
कभी मिलकर की,
गूफ्तगूं आपस में।
तब बे-पर्दा हो जाएगी,
मेरी आदत और तुम्हारी रवायत?
तुम ही नहीं यादें भी तुम्हारी,
शर्मिंदा न हो चाहता हूं मैं।

  • रविकुमार बाबुल

चित्र : साभार गूगल

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अनबुझी प्यास

Posted by babul on 2/23/2012 12:05:00 PM

एक वो था,
जो सारा समन्दर,
अपने प्रेम का,
मुझको सौंप देना चाहता था।

एक तुम हो,
जिसके पास मेरे लिये,
प्रेम का एक कतरा भी नहीं है।

यह मेरे नसीब की साजिश है,
या फिर,
उसकी बद्दुआ रही होगी?

जो रह गई,
मेरी प्यास अनबुझी,
तुम्हारे होते हुये भी।

  • रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार

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तेरी याद

Posted by babul on 2/14/2012 12:15:00 PM

सूरज की पहली किरणें,
दे जाती हैं रोज तेरी याद।
चांद की शीतलता,
सहलाती है तेरी याद।

क्यूं रात को अक्सर आकर,
आंखें मेरी धो जाती हैं तेरी याद।
रोज सोचता हूं भूल जाऊं तुझे,
न भूलने की कसम दे जाती है तेरी याद।

  • रविकुमार बाबुल


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अच्छी लड़की

Posted by babul on 2/12/2012 01:12:00 PM

आओ मित्र,
आज हम,
दोस्ती और प्यार को,
परिभाषाओं से कर दें आजाद।

अच्छी लड़की नहीं हूं मैं,
कहकर बेड़ी मत बांधो तुम,
अपने रिश्ते को जुड़ने में,
मैं भी अपने हिस्से का,
सारा आसमान दे दूंगा,
तुमको।

बस तुम,
प्यार का मुठ्ठी बर बादल,
कर देना मेरे नाम।
बरसते रहना ,
मेरे जीवन में,
बन कर "हां"।


  • रवि कुमार बाबुल


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मेरे लिये

Posted by babul on 2/10/2012 04:01:00 PM

प्रिय,
बस एक बार सुलझा दो,
पहेली मेरे जीवन की।
मेरे दिल की जमीं पर,
बो दो तुम कोई बीज।
उसका प्रस्फुटन होने से,
नहीं रोकूंगा कभी,
वह चाहे मुहब्बत हो या नफरत?
बस इन दोनों में से,
कुछ भी चुनों,
तुम मेरे लिये।

  •  रवि कुमार बाबुल


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